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यूरोप के सभी बड़े दार्शनिक मानते है की शरीर का आनंद ही चरम आनंद है और भारतवासी मानते है की इश्वर प्राप्ति का आनंद ही चरम आनंद है | इसीलिए यूरोप में जो भी किया जाता है वो शरीर के सुख के लिए किया जाता है और भारत में सब काम इश्वर प्राप्ति और मोक्ष प्राप्ति के लिए किया जाता है

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यूरोप और अमेरिका वाले सिर्फ शरीर का सुख चाहते है और सरीर का सुख एक तरीके से लेने के बाद उसमे उब हो जाती है फिर दुसरे तरीके से लेते है फिर उसमे उब होने के बाद तीसरे तरीके से …इसी तरह चलता है किउंकि शरीर का सुख ही सबकुछ है और वो ही जीवन का अंतिम लक्ष है | उनका मानना है के ये शरीर एक बार ही मिला है और आगे मिलेगा की नही पता नही क्योंकि न ही वो पुनर्जनम को मानते है न ही पुर्वजनम को इसीलिए शरीर का जितना सुख लेना है ले लो जितना भोग करना है कर लो उसके लिए समलैंगिकता में जाना पड़े तोह जाओ किसी और काम में जाना पड़े तोह चले जाओ | ये सब कुछ प्राप्ति है शरीर के माध्यम से इसीलिए पश्चिम में समलैंगिकता एक बहुत बड़ा प्रश्न है | पश्चिम के राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री को समलैंगिकता के प्रश्न पर चुनाव से पहले वादा करना पड़ता है, बाद में कानून भी बनाना पड़ता है उन लोगो के लिए |

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