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पत्रकार जीतेंद्र तिवारी की फेसबुक पोस्ट

“बरखा दत्त के एक पोस्ट पर बहस चली। याद दिलाना चाहता हूं करगिल। बरखा दत्त ने तब द्रास सेक्टर से एक लाइव रिपोर्ट की थी। उसके अगले ही दिन कुछ पत्रकारों का एक दल द्रास पहुंचा। उस दल में मैं भी शामिल था। द्रास की सेना चौकी उजाड़ थी। पता चला कि बरखा की लाइव रिपोर्ट के कुछ ही देर बाद पाकिस्तान से दागे गए तोप के गोले सीधे वहीं गिरे। वजह थी कि बरखा की लाइव रिपोर्ट में कैमरे के पीछे द्रास की चौकी साफ दिख रही थी। लोकेशन भी मिल गई। अब समझ आपकी है।”

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करगिल युद्ध और उसके बाद के वक्त में यह आरोप बार-बार लगता रहा है, लेकिन कोई भी इस बारे में खुलकर कुछ नहीं बोलता है। उस वक्त बरखा दत्त के साथ करगिल युद्ध की रिपोर्टिंग करने वाले पत्रकार, सेना और यहां तक कि उस वक्त की सरकार ने भी इस सवाल पर लगभग चुप्पी साधे रखी। हालांकि पत्रकारों और सेना के कुछ जवानों ने निजी बातचीतों में यह बात बताई है कि बरखा दत्त की रिपोर्टिंग की वजह से उस वक्त पाकिस्तानी सेना को काफी मदद मिली थी। यह किसी को नहीं पता कि यह मदद जानबूझ कर की गई थी या अनजाने में।

वकील जय भट्टाचार्जी ने सेना प्रमुख को लिखी थी खुली चिट्ठी

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