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लेखक (विष्णु शर्मा) – 1857 की लड़ाई को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम कहा गया। वीर सावरकर ने इसे लेकर एक किताब लिखी और बताया कि ये कैसे भारतीय आजादी का पहला स्वतंत्रता संग्राम था। लेकिन फिर भी लोगों ने सवाल उठाए कि सैनिक सूअर या गाय की चर्बी वाले कारतूसों से परेशान थे और मुगल बादशाह बहादुर शाह जफर, रानी लक्ष्मीबाई, नाना साहेब पेशवा, बेगम हजरत महल आदि अपने राज्य छिन जाने की वजह से, इसलिए ये जंग हुई। कई इतिहासकारों ने लिखा कि आम जनता इस संग्राम से नहीं जुड़ी, ऐसे में 1857 के ठीक बाद महाराष्ट्र की धरती से एक आजादी का मतवाला उठा, जिसका ना किसी राजपरिवार से कोई ताल्लुक था और ना ही महाराष्ट्र में तमाम तरह के आंदोलनों में सक्रिय रहे चितपावन ब्राह्मणों से। आर्थिक, सामाजिक और जातीय स्थिति में सबसे नीचे के तबके से उठा था वो योद्धा, जिसे अंग्रेजों ने डाकू कहा और आज की पीढ़ी उसे रॉबिनहुड से भी बेहतर पाएगी, नाम था वासुदेव बलवंत फड़के।

 

फड़के का ना पेशवा से कोई लेना देना था और ना ही शिवाजी के वंशजों से। ना ही शिवाजी और बाजीराव की तरह उसे युद्धकला विरासत में हासिल हुई थी। उसे तो उसकी मां ने योद्धा बनने पर मजबूर कर दिया। अपनी मां की वजह से वो मां भारती के करोड़ों लालों के लिए खड़ा हो गया, सब कुछ दांव पर लगाकर। उसने शिवाजी की तरह ही एक अंडरग्राउंड आर्मी खड़ी कर दी, वो भी तब जब पेशवा किनारे लग चुके थे, शिवाजी के वंशज पेंशन पर थे और अंग्रेजों का पूरे देश पर एकछत्र राज था। आर्मी भी उन लोगों की जो समाज के हाशिए पर थे। भील, डांगर, कोली, रामोशी आदि जातियों के युवाओं को मिलाकर खड़ी की गई ये आर्मी। शुरू से ही वासुदेव को कुश्ती और घुड़सवारी का शौक था। यहां तक कि उन्होंने स्कूल छोड़ दिया हालांकि बाद में पुणे के मिलिट्री एकाउंट्स डिपार्टमेंट में एक क्लर्क की नौकरी कर ली। मां उन्हें उनके नाम का अर्थ बताती थीं, तो उन्हें लगता था कि उनकी भी अपनों के लिए कुछ जिम्मेदारी है। एक दिन मां काफी बीमार थीं। मरने से पहले अपने बेटे से मिलना चाहती थीं। लेकिन अंग्रेज अफसर ने छुट्टी देने से मना कर दिया। वो अगले दिन बिना छुट्टी के घर चले गए लेकिन इतनी देर हो गई कि अंतिम वक्त में भी वो अपनी मां से ना मिल सके। पहली बार उनकी समझ में आया कि गुलामी क्या होती है। जिस मां से वो वीर महापुरुषों की कहानियां सुनते थे, जिसकी वजह से अपना काम पूरी मेहनत से कर्तव्य की तरह करते थे, उस मां से ही अंतिम दिन भी ना मिलने दे ये नौकरी, ये जीवन, सब व्यर्थ है। उन्हें लगा कि ना जाने कितनी मांएं हैं जो भारत मां की गुलामी के चलते अपने बेटों से नहीं मिल पाती होंगी। 15 साल की सरकारी नौकरी को लात मारकर उन्होंने भारत मां को अंग्रेजी गुलामी से मुक्त करने का प्रण ले लिया।

 आगे पढ़े- जिंदगी में भी उनकी मां के अलावा एक गुरु का बड़ा रोल था।

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