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हिन्दुस्तान जैव विविधता की दृष्टि में दुनिया के तमाम देशों से अलग है। दुनिया के सुदूर वनांचलों में रहने वाले आदिवासी आज भी इसी जैव विविधता के साथ सामंजस्य बनाते हुए जीवन व्यापन कर रहे हैं। पातालकोट (मध्यप्रदेश) और डांग (गुजरात) जैसे इलाकों के आदिवासी आज भी परंपरागत हर्बल ज्ञान को अपनाकर अपने रोगों का उपचार करते हैं। आदिवासी हर्बल जानकार जिन्हें भगत और भुमका कहा जाता है, वे इस ज्ञान के पारंगत है और सारा समुदाय इन्हें देवतुल्य मानता है। इस लेख के जरिए हम जिक्र करेंगे तीन अलग-अलग प्रकार के नींबू परिवार के फलों और उनकी उपयोगिता के बारे में…

  • लेंडी पीपर 5 नग, जिसे पिप्पली भी कहा जाता है। काली मिर्च (5), अदरक 2 ग्राम, नींबू रस (2 मिली) और चुटकी भर काला नमक लेकर मिलाया जाए। पीलिया के रोगी को दिन में कम से कम 2 बार दिया जाए तो पीलिया जल्दी ठीक हो जाता है।
  • एक चुटकी हल्दी, एक चम्मच दूध की मलाई को आधा चम्मच नींबू रस के साथ अच्छी तरह मिलाकर फोड़े फुंसियों पर लगा लेने से जल्द आराम मिलता है।
  • निर्गुण्डी का पौधा सारे भारत मे, विशेषकर गर्म प्रदेशों में पाया जाता है । इसके पौधे से तीव्र और अरूचिकर गंध आती है। इसके पत्तों को तीन-तीन के छोटे-छोटे समूहों में देखकर भी आसानी से पहचाना जा सकता है।
  • निर्गुण्डी की सूखी पत्तियां (करीब 15) और कागजी नींबू का रस (करीब 5 मिली) लेकर अच्छी तरह मिलाकर मिर्गी के रोगी कों 3-3 बूंदे दिन में 3 से 4 बार नाक में डाल लेनी चाहिए। लगातार 3-4 माह तक ऐसा करने से मिर्गी के दौरे कम हो जाते हैं।

  • कागजी नींबू ( Citrus aurantifolia ) नींबू जाति का खट्टा फल है। इसके फल 2.5 – 5 सेमी व्यास वाले हरे या पीले होते हैं। इसका पौधा 5 मीटर तक लम्बा होता है जिसमें कांटे भी होते हैं।

  • कागजी नींबू का रस और करीब एक कप नींबू के रस में 1 ग्राम काला नमक मिलाकर पीने से किडनी में फंसी पथरी बाहर निकल जाती है।

  • छांव में सुखाए गए संतरे के छिलकों को बारीक पीस लें और घी के साथ बराबर मात्रा में मिलाएं। इसे 1-1चम्मच दिन में 3 बार लेने से बवासीर में आराम मिलता है।

  • पके हुए कागजी नींबू में 2 से 3 लौंग, एक कालीमिर्च, 5 ग्राम अजवाइन , अदरक 3 ग्राम और चुटकी भर नमक भर दे। इस फल को छांव में 2 दिनों के लिए रख दें और जब यह सूख जाए तो इसका चूर्ण बना लें। चूर्ण की 1 ग्राम मात्रा दिन में तीन से 4 बार लेने से दस्त या पेट दर्द में आराम मिलता है।

  • मण्डूकपर्णी के पत्ते कुछ मांसल और छ्त्राकार होते है। इसके पत्तों का व्यास लगभग आधा इंच से लेकर एक इंच तक होता है।
    उत्तर भारत मे यह लगभग हर जगह पर छाया वाली जगह पर मिल जाता है । अधिकतर वैद्य इसी को असली ब्राह्मी मानते हैं।

  • मण्डूकपर्णी का संपूर्ण पौधा (3 ग्राम), चित्रक की जड़ों का चूर्ण (2 ग्राम), करंज की जड़ों का तेल (5मिली) लें। सारे मिश्रण को मिक्सर में पीस लें और इस मिश्रण में करीब 10 मिली छाछ और 3मिली नींबू का रस मिला लें। इसे चेहरे पर लगाएं तो यह चेहरे का तेज बढ़ाने में मददगार साबित होता है।

-चित्रक को चीता या चितावर भी कहते हैं। पूरे भारत में यह झाड़ी पाई जाती है। इसके तीन रंग के फूल हो सकते हैं। लाल, नीले और सफेद। इससे चित्रकादी वटी बनाई जाती है। जिसे अजीर्ण और वात रोगों में प्रयोग में लाया जाता है।

  • मुहांसो पर नींबू का रस लगाने से जल्द ही समस्या खत्म हो जाती है। नींबू के रस में सूक्ष्मजीवी को मारने की क्षमता होती है और माना जाता है कि चेहरे पर नींबू के रस की नियमित हल्की मालिश कई तरह के सूक्ष्मजीवी संक्रमण से बचाती है।
  • संतरे में ग्लूकोज व डेक्सटोल जैसे तत्त्व भरपूर मात्रा में होते हैं, जो शारीरिक शक्ति के लिए बहुत खास होते हैं। इसके अलावा संतरे के रस में विटामिन सी, विटामिन बी कॉम्लेक्स, विटामिन ए, कई खनिज तत्त्व, और कुछ मात्रा में पौष्टिक पदार्थ और अन्य पोषक तत्त्व भी पाए जाते हैं।
  • -आदिवासी नियमित रूप से संतरे का रस अपने बच्चों को पिलाते हैं। संतरे के रस में काला नमक और कुछ मात्रा में अदरक के रस को भी मिलाकर बच्चों को दिया जाता है, खासतौर से उस वक्त जब बच्चा बीमारी से उठता है। माना जाता है कि यह कमजोर शरीर में स्फूर्ति दिलाने का काम करता है।

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