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आर्युर्वेदीय चिकित्सा में रस भस्मों की प्रमुखता अकाट्य है। विशेषकर आज के युग में जबकि तुरन्त पीड़ा-हरण करनेवाली चमत्कारिक औषधों का प्रचार बढ़ रहा है आयुर्वेद में रस भस्म औषधें ही ऐसी हैं जो आधुनिक दवाओं के प्रचार का मुँह मोड़ने में सर्वथा समर्थ हैं।
ऐसी स्थिति में रस-भस्मों के सेवन करने की विधि और अनुपान आदि का पूरा ज्ञान होना अनिवार्य है। एक ही रस या भस्म अनुपान भेद से कई रोगों को नष्ट करती हैं। किस अनुपान से कौन-कौन रस-भस्म किस-किस रोग पर सर्वोपरि हैं, इसका ज्ञान दीर्घ अनुभव से ही हो सकता है।
– सभी भस्में रामबाण की भांति अचूक लाभ करने वाली होती हैं। जैसे ऐलोपैथी में इन्जेक्शन तत्काल असर करने वाले होते हैं, वैसे ही रस भस्में वस्तुतः आयुर्वेद के इन्जेकशन हैं। सर्वागपूर्ण उत्तम रस और विधिपूर्वक बनाई गई भस्म रोग की ठीक-ठीक निदान करके उचित अनुमान के साथ यदि दी जावे तो निश्चय ही इन्जेक्शन जैसा त्वरित लाभ देते हैं। इन्जेक्शन तो कभी-भी भयंकर हानि कर देते हैं, पर रस भस्म निरापद होते हैं।
– भस्में खनिज धातुओं से बनती। धातुएँ नुकसान सकती है पर भस्म नहीं।। आखिर केला, सेव आदि फलों और अन्य खाद्य पदार्थों में अनेक धातुएँ मिली रहती हैं जिन्हें हम खाते हैं। डॉक्टरी में भी सोना, चाँदी, लोहा, ताँबा आदि धातुओं का उपयोग दवा के रूप में प्रचुर मात्रा में होता है। प्राचीन शास्त्रों में बालक को जनमते ही सोना खिलाने का निर्देश है। प्राचीन शास्त्र प्रमाण से यह सिद्ध है कि धातु भस्में हर उम्र में लाभदायक होती हैं और कदापि हानिकर नहीं होती।
– अशुद्ध और कच्ची भस्में प्रत्येक मनुष्य को हर उम्र में हानि करती हैं। भारत में प्रायः सभी प्रदेशों में भस्म बनाने के काम को बपौती बनाने वाले ऐसे अनपढ़ और धूर्त लोग हैं जो जनता को, पंसारियों को और वैद्यों तक को ठगते रहते हैं। आयुर्वेद के प्राचीन ग्रन्थों में लिखी पुरानी प्रणाली से बनी भस्में ही लेना चाहिए।
– भस्म बनाते समय इन धातुओं पर विविध वनस्पतियों के संस्कार किये जाते हैं। एक टन त्रिफला चूर्ण से यदि सौ लोगों पर इलाज होगा, तो उसी चूर्ण के प्रभाव से बनाया भस्म 10,000 लोगों पर असर करेगा।
– जुकाम या सर्दी लगने पर बनप्सा की तरह अभ्रक भस्म दी जाती है, जिससे रोगी जल्दी अच्छा हो जाता है।
– काले रंग का अभ्रक आयुर्वेदिक औषधि के काम में लेने का आदेश है। साधारणत: अग्नि का इसपर प्रभाव नहीं होता, फिर भी आयुर्वेद में इसका भस्म बनाने की रीतियाँ हैं। यह भस्म शीतल, धातुवर्धक और त्रिदोष, विषविकार तथा कृमिदोष को नष्ट करनेवाला, देह को दृढ़ करनेवाला तथा अपूर्व शक्तिदायक कहा गया है। क्षय, प्रमेह, बवासीर, पथरी, मूत्राघात इत्यादि रोगों में यह लाभदायक कहा गया है।
– काष्ठादि दवा के साथ रस या भस्म का प्रयोग बहुत ही चमत्कारिक फल दिखाता है।
– पाण्डु संगहणी सोथ खून की कमी आदि में लौह या मण्डूर भस्म के मुकाबले लाभ करने वाली अन्य दवा नहीं है।
– स्वर्ण भस्म के सिवा दूसरी किस दवा में इतना ताकत है कि राजयक्ष्मा से रोगी की रक्षा कर सके।
– हीरा, मोती या प्रवाल भस्म के समान दिल को मजबूत करने वाली कौन सी दवा है।
– प्रमेह और धातुपुष्टि के लिए बंगभस्म के समान दूसरी औषधि है ही नहीं।
– शंख की भस्म के प्रयोग से विभिन्न रोगों से मुक्ति मिलती है।
– रक्त सम्बन्धी विकार में माणिक्य की भस्म शहद के साथ दी जाती है।
– पथरी में मोती भस्म शहद के साथ खिलाने से लाभ होता है।
– रक्तचाप में मुंगे की भस्म शहद के साथ दी जाती है।इसे प्रवाल भी कहा जाता है। यह दुर्बलता में भी लाभकारी है।
– हड्डियों का दर्द ,खांसी , बवासीर में पुखराज भस्म लाभकारी है।
– दांतों के रोग और बुद्धि विकास , प्रमेह के लिए गोमेद भस्म दूध या मलाई के साथ दी जाती है।
– हीरे की भस्म और लहसुनिया की भस्म बल और वीर्य है।
– वृद्धावस्था की समस्याओं को कम करने में अभ्रक का भस्म, सुवर्ण भस्म, रजत भस्मा, त्रिवंग भस्मा इत्यादि सहायक है।
– बच्चों की इम्युनिटी बढाने के लिए स्वर्ण भस्म दी जाती है।
– मधुमेह में स्वर्ण माक्षिक भस्म, अभ्रक भस्म, आदि का प्रयोग किया जाता है।

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