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bhamashah-Donation

मेवाड़, महाराणा प्रताप, हल्दीघाटी आदि की बात चलती है तो इस संघर्ष में महाराणा के लिए आर्थिक व्यवस्था करने वाले उनके मंत्री भामाशाह Bhamashah की चर्चा अवश्य चलती है| हर कोई मानता है और लिख देता है कि भामाशाह ने अपनी कमाई सारी पूंजी महाराणा को अकबर के साथ संघर्ष करने हेतु राष्ट्र्हीत में दान कर दी थी| इस तरह भामाशाह को महान दानवीर साबित कर दिया जाता है. ऐसा करने वाले समझते ही नहीं कि वे भामाशाह के बारे में ऐसा लिखकर उसके व्यक्तित्त्व, स्वामिभक्ति, कर्तव्य व राष्ट्रहित में दिए असली योगदान को किनारे कर उसके साथ अन्याय कर रहे होते है| आज भामाशाह की जो छवि बना दी गई है उसके अनुरूप भामाशाह का नाम आते ही आमजन में मन-मस्तिष्क में छवि उभर जाती है- एक मोटे पेट वाला बड़ा व्यापार करने वाला सेठ, जिसने जो व्यापार में कमाया था वो महाराणा को दान दे दिया|

जबकि इतिहासकारों की नजर में भामाशाह द्वारा महाराणा को दिया अर्थ कतई दान नहीं था, वह महाराणा का ही राजकीय कोष था जिसे सँभालने की जिम्मेदारी भामाशाह की थी| और भामाशाह ने उस जिम्मेदारी को कर्तव्यपूर्वक निभाया| यही नहीं कई इतिहासकारों के अनुसार भामाशाह ने मालवा अभियान में प्राप्त धन महाराणा को दिया था| यदि इतिहासकारों की बात माने तो भामाशाह व्यापारी नहीं, महाराणा के राज्य की वित्त व्यवस्था व राजकीय खजाने की व्यवस्था देखते थे| साथ ही वे एक योद्धा भी थे, जिन्होंने मालवा अभियान का सैन्य नेतृत्व कर वहां से धन लुटा और महाराणा को दिया| इस तरह भामाशाह एक योद्धा थे, जिनकी छवि एक व्यापारी की बना दी गई|

भामाशाह द्वारा महाराणा को दान देने की कहानी को राजस्थान के प्रसिद्ध इतिहासकार ओझा जी कल्पित मानते है| ओझा जी के मतानुसार- यह धनराशि मेवाड़ राजघराने की ही थी जो महाराणा कुंभा और सांगा द्वारा संचित की हुई थी और मुसलमानों के हाथ ना लगे, इस विचार से चितौड़ से हटाकर पहाड़ी क्षेत्र में सुरक्षित की गई थी और प्रधान होने के कारण केवल भामाशाह की जानकारी में थी और वह इसका ब्यौरा अपनी बही में रखता था|”

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