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नाजमा खान :  देश कोई भी हो बुर्का यानी की मुस्लिम महिला की पहचान है। कई देशों में बुर्का या फिर कहूं पर्दा करना कानूनन ज़रूरी है, तो वहीं कुछ देशों में बुर्का पहनने पर पाबंदी है (हाल ही में सुरक्षा कारणों से स्विट्जरलैंड के एक हिस्से में बुर्का पहनने पर कानूनी रोक लगा दी गई है।) ऊपर से नीचे तक ढके इस लिबास में से झांकती आंखे बहुत कुछ कह जाती हैं, बशर्ते की सुनने वाला हुनरमंद हो। कोई इसे बोझ समझता है तो किसी ने इसे अपने हक का हिस्सा बना लिया है। saudi-women-5624a87a86c93_l
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खैर, जिस तरह से मुस्लिम शब्द का इस्तेमाल करते ही आंखों के सामने टोपी और दाढ़ी तैर जाती है उसी तरह से मुस्लिम महिला का जिक्र होते ही बुर्का पहने एक खातून दिखाई देती है, पर हम सभी जानते हैं मौजूदा दौर में मुस्लिम महिलाओं ने अपनी नई पहचान बनाई है, वो बुर्के में हो या फिर ना भी हो पर उसका जिक्र दुनिया में शांति के लिए नोबेल (मलाला) लेने से लेकर सीरिया में ISIS की फौज में भर्ती होने तक पर हो रहा है (जिसकी मैं वकालत नहीं कर रही हूं) पर यहां मेरी चर्चा 12 दिसंबर को सऊदी अरब में होने वाले निगम चुनाव के तीसरे चरण को लेकर है, जिसमें पहली बार महिलाओं को चुनावी दंगल में कूदने का मौका मिला है।  भले ही चुनाव छोटे स्तर(निगम) के हों लेकिन उपलब्धि बहुत बड़ी है, वर्ना जिस देश में महिलाओं के पास कार ड्राइविंग का अधिकार ना और कार चलाने पर जेल जाना पड़ता हो उस माशरे में अपनी उम्मीदवारी पेश करना एवरेस्ट फतह करने से कम नहीं है।

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भले ही इस चुनाव में लड़ने वाली इन बुर्कानशीनों के वायदे बड़े-बड़े ना हो, बिजली,पानी कूड़े और ट्रैफिक जाम के मुद्दों पर घर से बाहर निकली इन खातुनों ने बता दिया कि मुल्क में महिलाओं की नई सुबह होने वाली है। ये तो महज पहला कदम है, लेकिन मंजिल तक पहुंचने के लिए पहला कदम ही सबसे मुश्किल होता है। आगे की राह खुद बा खुद मुक्कमल हो जाती है। हो सकता है इन महिलाओं को इस पहली कोशिश में शिकस्त मिले, लेकिन कोई फर्क नहीं पड़ता क्योंकि जो रहमत की बारिश सबके चेहरों को खिला देती है, उसकी पहली बूंद को धरती पर गिरते ही फना हो जाना पड़ता है, पर इंशा अल्ला ये मासूम कोशिश आगे चलकर रंग लाए। article-burqa2-1123

कई बार मुझे बहुत दुख होता है, कि जिस इस्लाम ने शायद दुनिया में सबसे पहले महिलाओं के हक की बात की थी आज उसी मज़हब की महिलाएं अपनी ख्वाहिशों के लिए इस तरह की जद्दोजहद कर रही हैं। खुद भारत में अभी कुछ दिन पहले 70 हजार महिलाओं के संगठन ‘भारतीय मुस्लिम महिला आंदोलन’ने पीएम को एक पत्र लिखकर मुस्लिम पर्सलन लॉ में सुधार की मांग की है।

बेशक जहां सुधार की गुंजाइश हो उसे होना ही चाहिए, लेकिन कुछ ग़लतियां हमारी अपनी भी हैं, हम अपने हकों की बात तो कर रही हैं, पर हममें से कितनी ऐसी मुस्लिम महिलाएं हैं जिन्हें ठीक से अपने हक मालूम भी हैं, इसलिए सबसे पहले इल्म चाहिए। इल्म मिल गया तो हम खुद ही अपना हिसाब-किताब नाइंसाफी करने वाले से कर लेंगी।

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