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इस्तान्बुल हमले में मारे गए एयरपोर्ट कर्मचारियों को श्रद्धांजलि देते तुर्की के राष्ट्रपति।

लेखक: अवधेश कुमार।।
तुर्की के इस्तान्बुल, बांग्लादेश के ढाका और भारत के हैदराबाद में कोई समानता नहीं। तीनों की भौगोलिक दूरी भी काफी है। लेकिन एक खतरनाक पहलू ने तीनों को जोड़ दिया। बीते 28 जून को इस्तान्बुल के मुख्य अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर गोलीबारी करने के बाद तीन आत्मघाती हमलावरों ने खुद को उड़ा लिया। इस हमले में 41 लोग मारे गए और कई घायल हो गए। जल्द ही यह साफ हो गया कि हमले के पीछे आतंकी संगठन आईएसआईएस का हाथ था। ठीक इसी दिन राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) ने पुरानी हैदराबाद सिटी में 10 जगह छापा मारकर 11 ऐसे लोगों को सबूत के साथ गिरफ्तार किया, जो आईएस के संपर्क में थे।

इन्हें हमला करने के लिए आईएस ने धन और हथियार मुहैया कराए थे। इनके पास से विस्फोटक, हथियार और 15 लाख रुपये नकद मिले। इसके ठीक चार दिन बाद ढाका के राजनयिक क्षेत्र के एक प्रमुख रेस्तरां में आतंकवादियों ने हमला किया। बांग्लादेश सरकार इस हमले के लिए पाकिस्तान की आईएसआई को जवाबदेह ठहरा रही है लेकिन इसमें आईएस का हाथ होने की आशंका ज्यादा है, भले ही उसकी प्रत्यक्ष भागीदारी न हो। कहा जा रहा है कि इसमें शामिल युवक स्थानीय थे। इनमें एक तो मंत्री का बेटा बताया जा रहा है। इन नौजवानों पर आईएस की उस वहाबी विचारधारा का प्रभाव है, जिसका मकसद दुनिया को दारुल हर्ब से दारुल इस्लाम में बदलना, यानी पूरे विश्व में ‘एक सच्चा इस्लामी राज्य’ कायम करना है।

आत्मघात की लहर
थोड़ा पीछे लौटें तो 22 मार्च 2016 को ब्रसल्ज़ हवाई अड्डे के चेक इन एरिया में आत्मघाती हमला हुआ था, जिसमें 16 लोगों की मौत हो गई। इसके बाद शहर के सबवे स्टेशन पर भी धमाका हुआ, जिसमें 16 लोगों की मौत और हुई। यहां भी हमलावर आईएस ही था। उसके बाद 13 जून को अमेरिका के ओरलैंडो में समलैंगिक पल्स नाइट क्लब में हमला कर 53 लोगों को मौत के घाट उतारने वाला हमलावर भी आईएस से ही प्रभावित था। इस हमले की आईएस ने जिम्मेदारी भी ली। हाल के कई हमलों और छापों में पकड़े गए लोगों को मिला दें तो एक साथ कई देश एक ही पायदान पर खड़े नजर आएंगे।

अगर किसी ने यह सोचकर मरने का निश्चय कर लिया है कि इससे उसे जन्नत मिलेगी, तो उससे निपटना कठिन होता है। आईएस अभी ऐसे ही आत्मघाती दस्तों का इस्तेमाल कर रहा है। अपना मकसद पाने के लिए वह दुनिया के सबसे व्यस्त इलाकों में कार्रवाई कर रहा है, ताकि सबका ध्यान खींच सके। इस्तान्बुल का अतातुर्क एयरपोर्ट दुनिया के सबसे व्यस्त हवाई अड्डों में गिना जाता है। ब्रसल्ज़ हवाई अड्डे का भी वही हाल है। ढाका के डिप्लोमैटिक एरिया में 34 देशों के दूतावास हैं। हैदराबाद भारत का प्रमुख मेट्रो शहर है।

भारत में भी नौजवानों का एक तबका आईएस की विचारधारा की गिरफ्त में आ गया है। इस साल जनवरी में एनआईए ने देश के अलग-अलग शहरों से आईएस से जुड़े 14 लोगों को गिरफ्तार किया था, जिनमें दो हैदराबाद के थे।accused आईबी ने इनपुट दिया था कि हैदराबाद के कुछ संदिग्ध सीरिया में आईएस के हैंडलर्स के संपर्क में हैं। वहां से उन्हें धन भी मिल रहा है। इसके बाद यह जानकारी एनआईए को दी गई। एनआईए ने जब इलेक्ट्रॉनिक सर्विलांस बढ़ाया तो पाया कि आरोपी ज्यादातर वक्त सीरियाई हैंडलर्स के संपर्क में रहते थे। ये लोग बाहर भी काफी कम आते थे। भारत में किसी बड़े आतंकी हमले को अंजाम देने के लिए इन्हें पैसे और हथियार मुहैया कराए गए थे।

बीती 31 मई को खबर आई कि जांच एजेंसियों ने ऐसे 500 से भी ज्यादा युवकों की पहचान की है, जो सोशल साइट्स के जरिए आईएस के साथ संपर्क में हैं। ये इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए आईएस के साथ जुड़ना चाहते हैं। जांच एजेंसियों के हवाले से कहा गया कि कश्मीर, केरल, कर्नाटक, महाराष्ट्र, यूपी से लेकर पश्चिम बंगाल तक के युवक इसमें शामिल हैं। ये लोग ट्रिलियन काको, निम्बूज, वीबर हाइक, टॉकरे और ग्रुप मी जैसी वेबसाइट्स के जरिए एक-दूसरे के संपर्क में रहते हैं, ताकि इराक और सीरिया पहुंच कर एक सर्वमान्य खलीफा की हुकूमत की स्थापना की लड़ाई में शामिल हो सकें।terror
अधिकारियों का कहना है कि ये युवक पहले जैश-ए-मोहम्मद, इंडियन मुजाहिदीन और दूसरे संगठनों से प्रभावित थे। लेकिन अब ये आईएस की विचारधारा से प्रभावित हो रहे हैं। जांच एजेंसियों का मानना है कि गुमराह युवकों को यकीन है कि पश्चिमी देशों की दमनकारी नीतियों का विरोध आईएस ही कर सकता है। लिहाजा उन्हें इस लड़ाई में आईएस का साथ देना चाहिए। हाल में एनआईए ने मुंबई से 18 लोगों को पकड़ा जो मुद्दबिर शेख की अगुआई में आईएस से जुड़ने के लिए इराक और सीरिया जा रहे थे। हैदराबाद को छोड़कर जांच एजेंसियों ने अब तक 49 ऐसे लोगों की गिरफ्तारी की है जो इराक और सीरिया जाने की फिराक में थे।

सघन कूटनीति जरूरी
इसमें कोई दो राय नहीं कि आईएस के छोटे ग्रुप हैदराबाद को ही नहीं, अन्य भारतीय शहरों को भी ढाका, इस्तान्बुल, ब्रसल्ज़ और ओरलैंडो में बदल सकते हैं। भारत को नए सिरे से कमर कसने की आवश्यकता है, हालांकि अंततः दुनिया की आतंकवाद विरोधी एकता से ही इसका सामना किया जा सकता है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी संयुक्त राष्ट्र द्वारा आतंकवाद की परिभाषा तय करने तथा आतंकवाद के विरोध में पूरी दुनिया की एकजुटता की अपील कर रहे हैं। इस दिशा में भारत की कूटनीति को और सघन बनाया जाना चाहिए।

(लेखक राजनीति विश्लेषक हैं)

डिसक्लेमर : ऊपर व्यक्त विचार लेखक के अपने हैं

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