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बात 2011 की है जब रूस में कट्टरपंथी ईसाई वामपथियों ने रूस में भगवत गीता जो कि सनातन धर्म का धार्मिक ग्रंथ है, उसपर पाबंदी लगाई जाये कि याचिका दी जिसमें  कहा गया कि गीता हिंसा `फैलाती है, भेदभाव फैलाती है, इसपर पाबंदी लगना चाहिए ।उस समय ऐसा प्रतीत हो रहा था की सचमुच भगवत गीता पर पाबंदी लग ही जाएगी ।

इस खबर के बाद भारत तथा रूस के हिंदुओं में रोष फैल रहा था ।जगह-जगह वामपंथियों के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे थे । दरअसल, रूस के चर्च इस बात से घबरा रहे थे की भगवत गीता के संपर्क में आने से आज भी कई लोग हिन्दू धर्म की ओर आकर्षित हो रहे थे ।

रूस में गीता के समर्थक एक होने लगे और अपना विरोध रूसी राष्ट्रपति पुतिन और प्रधानमंत्री मेदवेदेव तक पहुंचाया। रूस और भारत से लोगों ने इन दोनों नेताओं से हस्तक्षेप करने की मांग की । पुतिन के पास मामला जैसे ही आया, तोम्स्क शहर के कानून विभाग ने तोम्स्क कोर्ट में याचिका डाली  और गीता पर प्रतिबंध कि याचिका को निरस्त करने की मांग की । सरकारी याचिका ने कोर्ट को बताया की भवत गीता में कोई भी हिंसात्मक सीख नहीं है । और वो कोई भी भेदभाव नहीं फैलाती। क्यूंकि मामले को खुद पुतिन ने उठाया था तो कोर्ट ने कट्टरपंथियों कि याचिका खारिज कर दी। इस तरह पुतिन भगवत गीता पर पाबंदी लगाने से बचा लिया ।

 

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