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भगवत्साक्षात्कार में मानव-देह का महत्व 12310628_698084470291962_3766654194036195169_n

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अनोखा रत्न पाकर यदि उसको मिट्टी में गाड़ दिया जाय तो कुछ शोभा नहीं देता है। यदि उसी को किसी आभूषण में जड़ा दिया जाय तो वह सुशोभित होता है। इसी प्रकार इस मनुष्य शरीर को क्षुद्र कर्मों में लगाने से कुछ शोभा नहीं। भगवत्सेवन में लगा दिया जाय तो शोभा कि सीमा नहीं। भगवान ऋषभ देव जी ने अपने पुत्रों से कहा है-

नायं देहो देहभाजां नृलोके कष्टान कामानर्हते विड्भुजां ये।
तपो दिव्यं पुत्र का येन सत्त्वं शुद्धयेद्यस्माद् ब्रह्मसौख्यं त्वनंतम्।।
(श्रीमद्भागवत ५।५।१)

अर्थात् यह देह क्षुद्र कर्मों के लिये नहीं है; किंतु तप द्वारा अंत: करण की शुद्धी से अनंत ब्रह्मसुख का अनुभव करने के लिये है। विषय सुख तो कूकर-शूकर- गर्दभादि योनियों में भी उपलब्ध हो सकते है।

यह मानवीय शरीर परमेश्वर की देन है कि जिससे नित्यनिरतिशत आनंद का अनुभव होता है तथा जो भगवान से भेंट करने के लिये उपयुक्त है। जैसे की पूर्व काल में बहुत से भक्तों को भगवान के साक्षात दर्शन हुए थे। ऐसी सोपान भूत मानव- योनियो को पाकर जो प्राणी अपना कल्याण नहीं कर पाता, उससे बढ़कर महापापी एंव आत्मघाती कौन हो सकता है?

योने: सहस्राणि बहूनि गत्वा दु:खेन लब्ध्वापि हि मनुषत्वम।
सुखावहं ये न भजंति विष्णुं ते वै मनुष्यात्मनि शत्रुभूता: ।।
सोपानभूतं नात्मानं तस्मात्पापतरोऽत्र क:।।
(पुराण)

यद्यपि यह मानुष-कलेवर सुदुर्लभ है, तथापि क्षण-भंगुर है। इसका विश्वास कभी नहीं किया जा सकता है। अत: वस्तु से नित्य वस्तु को प्राप्त करना ही परम लाभ है। मनुष्य- शरीर का वाहन है कि जिसका सहारा लेकर मनुष्य अपने स्वरूप का साक्षात्कार कर सकता है।

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