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2013 की बात है, एक क्रांतिकारी की अस्थियां 70 साल बाद जापान से भारत लाई जा रही थीं। ना नेशनल मीडिया में किसी ने कोई खास तवज्जो दी और ना उनके शहर चंदन नगर में उनकी अस्थियां पहुंचीं तो कोई भी बड़ा चेहरा इस मौके पर वहां पहुंचा। उनकी राख हुगली में प्रवाहित कर दी गई, ये खबर न किसी चैनल की सुर्खियां बनी, ना पीएम ने तवज्जो दी और ना सीएम को पता चला। चंदन नगर के मेयर जापान से उन्हें लेकर आए थे। आप देश के बच्चे बच्चे से पूछ लीजिए, बचपन से पढ़ते-सुनते आते हैं कि जापान के रेनकोजी मंदिर में नेताजी सुभाष चंद्र बोस की अस्थियां रखी हैं, भले ही कोई अब भी नहीं मानता कि उनकी मौत हो गई है, लेकिन एक दूसरे ‘बोस’ की अस्थियां उसी जापान से आती हैं, इलेक्ट्रोनिक मीडिया के दौर में ना कोई खबर बनती है, ना कोई विवाद।rash_behari_bose 1412

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ये एक मिसाल भर है कि देश कैसे एक जैसे कद वाले दो व्यक्तियों के साथ अलग-अलग व्यवहार करता है और ये व्यवहार करने की वजह हैं इतिहासकार और राजनेता, जिन्होंने अपनी मर्जी से किसी के भी कद को उठाकर महामानव बना दिया और किसी महामानव को आने वाली पीढ़ियों की जानकारी में भी ना आ पाए, ऐसे इंतजाम कर दिए। जापान से सुभाष चंद्र बोस का नाता हमारे देश में सबको पता है लेकिन आप ये जानकर चौंक जाएंगे कि जापान में इतिहास पढ़ने-पढ़ाने वाले लोगों और राजनेता-राजनयिकों को छोड़ दिया जाए तो सुभाष चंद्र बोस को जानने वाले उंगलियों पर हैं और एक दूसरे बोस को आज हर जापानी घर में जाना जाता है, और जानने की वजह भी खासी हैरतअंगेज है। वो क्रांतिकारी जिसने आजाद हिंद फौज की नींव रखी, उसका झंडा और नेतृत्व सुभाष चंद्र बोस के हवाले किया, उसको एक खास किस्म की करी को ईजाद करने के लिए सारे जापान में जाना जाता है। ये थे रास बिहारी बोस।

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