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Asia, India, Uttar Pradesh, Varanasi, Vishwanath Temple. (Photo by: JTB Photo /UIG via Getty Images)

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भारतवर्ष में किसी भी क्षेत्र में कोई नई बसावट होती है तो शुरूआत में वहां लोकदेवता का वास होता है। भैरव इनमें प्रमुख हैं। भैरवजी एवं अन्यत लोकदेवता अज्ञात समस्याओं से बचाने में हमारी मदद करते हैं। जब स्थान का विकास होने लगता है तो क्षेत्र में हनुमानजी के मंदिर अधिक दिखाई देने लगते हैं। हनुमान मूल रूप से शिव के रुद्र हैं। हनुमानजी के साथ ही शिव के मंदिर भी अस्तित्व में आते हैं और इसके बाद शक्ति के रूप सामने आने लगते हैं और स्थापना होती है शक्ति के देवी मंदिरों की।

सभ्यता अपने विकास के अगले दौर में पहुंचती है, तो वहां भगवान गणेश आ विराजते हैं। वे न केवल शक्ति स्वरूप रूद्र और गणों के अधिपति हैं बल्कि रिद्धी और सिद्धी के अधिपति भी हैं। सभ्यता की समृद्धि अपने शीर्ष पर होती है तब वहां विष्णु मंदिरों की बहुतायत दिखाई देने लगती है। किसी नई बस्ती  अथवा कॉलोनी में यह विकास अधिक स्पष्ट दिखाई देता है।

किसी स्थान विशेष पर मंदिरों के विकास का यह क्रम मोटे तौर पर ऐसा होता है। इसके साथ ही हर देव का एक विशेष क्षेत्र है। काशी में महादेव हैं, तो कामाख्या। में देवी, वृंदावन में कृष्ण हैं, तो मुंबई में गणेश, कर्नाटक में मुरूगन हैं तो मदुरै में महालक्ष्मी। इन बड़े समूहों को हम नोड की तरह मान सकते हैं, जहां पूरी भारत भूमि एक सूत्र में बंधी है और देव अपने अपने कोण संभाले हुए है।

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