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फोटो | आईएएनएस
शराबबंदी के फैसले से बिहार सरकार को राजस्व का भारी नुकसान होगा, लेकिन राज्य और नतीजतन नीतीश कुमार को इससे बड़ा फायदा हो सकता है.

आज से तकरीबन एक दशक पहले जब नीतीश कुमार ने बिहार की सत्ता संभाली तो इसके कुछ महीने बाद ही प्रदेश के लगभग हर हिस्से में शराब की दुकानें तेजी से खुलने लगीं. उस वक्त नीतीश के कई आलोचक इसे आधार बनाकर उन पर हमला बोलते थे. कहा जाता था कि नीतीश कुमार ने राजस्व के चक्कर में पूरे सूबे को मयखाने में तब्दील करने का काम शुरू कर दिया है.

नीतीश के कार्यकाल के शुरुआती साल में शराब पर वसूले जाने वाले शुल्कों से बिहार सरकार को जितनी आमदनी होती थी, वह 2015—16 आते-आते दस गुनी से भी अधिक हो गई. सरकार के ही आंकड़े बताते हैं कि जहां 2005-06 सरकार को इस मद से 295 करोड़ रुपये की आमदनी होती थी, वह 2014-15 में यह 3,650 करोड़ रुपये हो गई. 2015—16 में लक्ष्य 4,000 करोड़ का रखा गया था. यही वजह है कि शराबबंदी की घोषणा करते हुए नीतीश कुमार ने कहा कि उनकी सरकार के इस कदम से सरकारी खजाने को तकरीबन 4,000 करोड़ रुपये का सालाना नुकसान होगा लेकिन सरकार इससे निपटने के लिए रास्ता निकाल लेगी.

सवाल यह उठता है कि जिस व्यक्ति के कार्यकाल में बिहार में शराब की दुकानों की संख्या काफी तेजी से बढ़ी, वही व्यक्ति अब आखिर क्यों इस पर पाबंदी लगा रहा है. 

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