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किताबें नहीं, तलवारें-लाठियां पकड़ाइये बच्चों के हाथ
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संचिता उपाध्याय : क्या बनाना चाहते हैं अपने बच्चों को? डॉक्टर? इंजिनियर? ऑन्त्रप्रन्यॉर? अजी छोड़िए! क्या करेंगे ये सब बनाकर? बच्चों को कुछ सिखाना ही है तो ऐसा कुछ सिखाइये जो उनके काम आए। जिसे सीखकर वह याद करें कि शुक्र है हमारे मां-बाप ने हमें यह सिखाया इसलिए हम जी पा रहे हैं।
नैतिकता? सौहार्द्रपूर्ण होना? सम्प्रभु होना? ना जी। इन बातों को सिखाकर भी कुछ हासिल नहीं होगा। अपने बच्चों को तलवारें, चाकू, छुरियां चलाना सिखाइये। लठैती सिखाइए। मल्ल युद्ध करना सिखाइए। जूडो, कराटे, मार्शल आर्ट्स… क्योंकि आज जो दिन आप देख रहे हैं न, यह तो झलक भर है। बर्बरता पूर्ण दिन तो अब शुरू होंगे।

सत्ता नपुंसकों की तरह बैठकर हर तरफ के अतिवादियों का तांडव देख रही है। चाहे पम्पोर में हो या रोहतक में, सिर्फ मौत नाच रही है। ऐसे में, क्या आपकी जिम्मेदारी नहीं बनती कि आप अपने बच्चों की सुरक्षा सुनिश्चित करें? टैक्स देकर जिस पुलिस बल को आपने बिठाया है, वह क्या कर रहा है? जहां शांति रखनी है वहां लाठियां बरसा रहा है, और जहां लाठियां बरसानी हैं वहां हाथ जोड़कर लोगों से विनती कर रहा है कि शांति बनाए रखें। विनती भी किससे, उन लोगों से जो सरकार से नाराज हैं, लेकिन आम आदमी की वे दुकानें, मॉल, घर, गाड़ियां इत्यादि फूंक रहे हैं जो किसी सरकार ने उन्हें खरीदकर नहीं दी हैं।

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