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मानव सभ्यता के विकास के साथ-साथ ज्ञान-विज्ञान की अनेक शाखाओं, प्रशाखाओं का जन्म हुआ एवं समय के प्रवाह ने उनके परिणामों के आधार पर उनमें अनेक संशोधन एवं परिवर्ध्दन को रूपायित किया। प्रकृति ने इस अखिल ब्रहमाण्ड में अनंत वैज्ञानिक प्रणालियाँ दे रखी हैं। हम एक वैज्ञानिक प्रणाली की खोज करते हैं तो उसके अन्दर अनेक वैज्ञानिक प्रणालियाँ कार्यरत दिखती हैं। यदि हम सहज चित्त से उन्हें देखते हैं तो वे हमें विस्मय और आनन्द से रोमांचित कर देती हैं और यहीं से योग की भूमि तैयार होती है। शिवसूत्र में भगवान शिव ने इसीलिए विस्मय को योग की भूमिका कहा है – ‘विस्मयों योग भूमिका’। यहीं से सूक्ष्म-जगत से जुड़े प्रकृति प्रदत्त विज्ञान से मानव का परिचय होता है। इस क्षेत्र में भी अनन्त वैज्ञानिक प्रणालियाँ हैं और इन पर अनेक प्रामाणिक ग्रंथ उपलब्ध हैं। इन्हीं वैज्ञानिक प्रणालियों में एक स्वरोदय विज्ञान भी हैं।

जिस स्वरोदय विज्ञान की हम यहाँ चर्चा करने जा रहे हैं उसका सम्बन्ध मानव के श्वास-प्रश्वास से है। यहाँ यह स्पष्ट करना आवश्यक है कि स्वरोदय विज्ञान और प्राणायाम दोनों एक नहीं हैं। स्वरोदय विज्ञान हमारे शरीर में निहित श्वास-प्रश्वास की व्याख्या करता है, जबकि प्राणायाम श्वास-प्रश्वास का व्यायाम है। हालाँकि दोनों का साधक उन सभी आध्यात्मिक विभूतियों का स्वामी बनता है जिनका उल्लेख ग्रंथों में मिलता है।kundalini

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स्वरोदय विज्ञान एक अत्यन्त प्राचीन एवं गुहय विज्ञान है। तत्व-मीमांसा (Metaphysics) की अनेक शाखाओं-प्रशाखाओं की जितनी खुलकर चर्चा सामान्यतया हुई है, उतनी स्वरोदय की नहीं हुई है। जबकि इसका अभ्यास सामान्य व्यक्ति के लिए काफी लाभदायक है। एक ज्योतिषी के लिए तो इसका ज्ञान अत्यन्त आवश्यक माना गया है। शिव स्वरोदय तो यहाँ तक कहता है कि स्वरोदय विज्ञान से रहित ज्योतिषी की वही दशा होती है जैसे बिना स्वामी के घर, शास्त्र विहीन मुख और सिर के बिना शरीर की। शिव स्वरोदय इस विज्ञान को अत्यन्त गोपनीय बताता है :

गुह्याद्     गुह्यतरं     सारमुपकार-प्रकाशनम्।

इदं स्वरोदयं ज्ञानं ज्ञानानां मस्तके मणि॥

(अर्थात् यह स्वरोदय ज्ञान गोपनीय से भी गोपनीय है। इसके ज्ञाता को सभी लाभ मिलते हैं। यह विभिन्न विद्याओं (गुह्य) के मस्तक पर मणि के तुल्य है।)

शायद इसीलिए अन्य गुह्य विद्याओं की तरह यह विद्या जन-सामान्य में प्रचलित नहीं हुई, जबकि सामान्य व्यक्तियों के उपयोग में आने वाली अत्यन्त लाभदायक बातों की चर्चा भी इसके अन्तर्गत की गई है।

स्वरोदय विज्ञान पर अत्यन्त प्रसिध्द ग्रंथ शिव स्वरोदय है। इसके अतिरिक्त परिव्राजकाचार्य परमहंस स्वामी निगमानन्द सरस्वती जी ने अपने ग्रंथ ‘योगी गुरु’ में पवन विजय स्वरोदय नामक एक ग्रंथ का उल्लेख किया है। स्वामी राम ने अपनी पुस्तक Path of Fire and Light, vol.I में एक और ग्रंथ ‘स्वर विवरण’ की चर्चा की है। बिहार योग विद्यालय, मुंगेर के संस्थापक एवं प्रसिध्द स्वरोदय वैज्ञानिक (साधक) स्वामी सत्यानन्द सरस्वती ने अपने ‘स्वर योग’ नामक ग्रंथ में इस विषय पर अत्यन्त विशद चर्चा की है। साथ ही, उन्होंने अपने इस ग्रंथ में शिव स्वरोदय का मूल पाठ भी हिन्दी अनुवाद के साथ प्रकाशित किया है। स्वामी जी ने इस विज्ञान पर तमिल भाषा में लिखित स्वर चिन्तामणि नामक ग्रंथ का उल्लेख किया है।

स्वरोदय विज्ञान के अंतर्गत यहाँ मुख्य रूप से वायु, नाड़ी, तत्व, सूक्ष्म स्वर प्रणाली, इनके परस्पर सम्बन्ध, आवश्यकता के अनुसार स्वर बदलने की विधि तथा विभिन्न कार्यों के लिए स्वरों एवं तत्वों का चुनाव आदि की चर्चा की जाएगी। इसके अतिरिक्त, यहाँ स्वर के माध्यम से अपने स्वास्थ्य का ज्ञान प्राप्त करना एवं स्वर के माध्यम से विभिन्न रोगों के उपचार पर भी प्रकाश डाला जायेगा।

जीवनी शक्ति श्वास में अपने को अभिव्यक्त करती है। श्वास के द्वारा ही प्राणशक्ति (जीवनीशक्ति) को प्रभावित किया जा सकता है। इसलिए प्राण शब्द प्राय: श्वास के लिए प्रयुक्त होता है और इसे कभी प्राण वायु भी कहा जाता हैं। हमारे शरीर में 49 वायु की स्थितियाँ बतायी जाती है। इनमें से दस हमारी मानसिक और शारीरिक गतिविधियों को संचालित करती हैं। यौगिक दृष्टि से इनमें पाँच सबसे अधिक महत्वपूर्ण हैं:- प्राण, अपान, समान, व्यान ओर उदान।

प्राण वायु का कार्यक्षेत्र कण्ठ से हृदय-मूल तक माना गया है और इसका निवास हृदय में। इसकी ऊर्जा की गति ऊपर की ओर है। श्वास अन्दर लेना, निगलना, यहाँ तक कि मुँह का खुलना प्राण वायु की शक्ति से ही होता है। इसके अतिरिक्त, ऑंख, कान, नाक और जिह्वा ज्ञानेन्द्रियों द्वारा तन्मात्राओं को ग्रहण करने की प्रक्रिया में भी इसी वायु का हाथ होता हैं। साथ ही यह हमारे शरीर के तापमान को नियंत्रित करती है तथा मानसिक क्रिया जैसे सूचना लेना, उसे आत्मसात करना और उसमें तारतम्य स्थापित करने का कार्य भी सम्पादित करती है।

अपान वायु का प्रवाह नाभि से नीचे की ओर होता है और वस्ति इसका निवास स्थल है। शरीर की उत्सर्जन क्रियाएँ इसी शक्ति से संचालित होती हैं। इस प्रकार यह वृक्क, ऑंतें, वस्ति (गुदा), मूत्राशय एवं जननेन्द्रियों की क्रियाओं को संचालित करती है। अपान वायु में व्यतिक्रम होने से मनुष्य में प्रेरणा का अभाव होता है और वह आलस्य, सुस्ती, भारीपन एवं किंकर्तव्यविमूढ़ता से ग्रस्त हो जाता है।

समान वायु हृदय और नाभि के मध्य सक्रिय रहती है और चयापचय गतिविधियों (Metabolic Activities) का नियमन करती है। कहा जाता है कि मुक्ति का कारक भी यही प्राण है। इसका निवास स्थान नाभि और ऑंतें हैं। यह अग्न्याशय, यकृत और अमाशय के कार्य को प्रभावित करती है। इसके अतिरिक्त यह हमारे भोजन का पाचन करती है और पोषक तत्वों को अपशिष्ट पदार्थों से विलग भी करती है। इसकी अनियमितता से अच्छी भूख लगने और पर्याप्त खाना खाने के बाद भी खाए हुए भोजन का परिपाक समुचित रूप से नहीं होता है और चयापचय गतिविधियों के कारण उत्पन्न विष शरीर में ही घर करने लगता है, जिससे व्यक्ति अम्ल दोष का शिकार हो जाता है। जब यह प्राण संतुलित होता है तो हमारी विवेक बुध्दि सक्रिय रहती है और इसके असंतुलन से मानसिक भ्रांति और संशय उत्पन्न होते हैं।

उदान वायु प्राण वायु को फेफड़ों से बाहर निकालने का कार्य करती है। इसका निवास स्थान कंठ है और यह कंठ से ऊपर वाले भाग में गतिशील रहती है। यह नियमित होने पर हमारी वाक्क्षमता को सशक्त बनाती है और इसकी अनियमितता स्वर-तंत्र और श्वसन तंत्र की बीमारियों को जन्म देती है। साथ ही इसमें दोष उत्पन्न होने से मिचली भी आती है। सामान्य अवस्था में उदान वायु प्राण वायु को समान वायु से पृथक कर व्यान वायु से संगम कराने का कार्य करती है।

व्यान वायु का जन्म प्राण, अपान, समान और उदान के संयोग से होता है। किन्तु व्यान के अभाव में अन्य चार वायु का अस्तित्व असंभव है, अर्थात् सभी प्राण एक दूसरे पर आश्रित हैं। व्यान वायु हमारे शरीर का संयोजक है। प्राण वायु को पूरे शरीर में व्याप्त करना, पोषक तत्वों का आवश्यकतानुसार वितरण, जीवन ऊर्जा का नियमन, शरीर के विभिन्न अंगों को स्वस्थ रखना, उनके विघटन पर अंकुश लगाना आदि इसके कार्य हैं। यह पूरे शरीर में समान रूप से सक्रिय रहती है। पूरे शरीर में इसका निवास है। ज्ञानेन्द्रियों की ग्राहक क्षमता का नियामक व्यान वायु ही है। सभी ऐच्छिक एवं अनैच्छिक शारीरिक कार्यों का संचालन व्यान वायु ही करती हैं। हमारे शरीर का पर्यावरण के साथ संवाद या पर्यावरण के प्रति हमारी शारीरिक प्रतिक्रियाएं इसी वायु (प्राण) के कारण होती है।

इन पाँचों प्राणों के द्वारा पाँच उपप्राणों का सृजन होता है जिन्हें नाग, कूर्म, कृकल (कृकर) देवदत्त और धनंजय कहा जाता है। नाग वायु के कारण डकार एवं हिचकी आती हैं और मानसिक स्पष्टता (Clarity of Mind) बनी रहती है। पलकों का झपकना कूर्म वायु के कारण होता है। कृकल (कृकर) से भूख और प्यास लगती है तथा छींक आती हैं। देवदत्त के कारण जम्हाई आती है और यह निद्रा का कारक है। अन्तिम उपवायु धनंजय व्यान वायु की भाँति सर्वव्यापी है और मृत्यु के बाद भी कुछ समय तक शरीर से चिपकी रहती है – न जहाति मृतं वापि सर्वव्यापी धनंजय।

इनके अतिरिक्त एक और वायु कही गयी है जिसे महावायु कहते हैं और यह हमारे मस्तिष्क की गतिविधियों को संचालित करती है।

उक्त वायु (प्राण) हमारे पूरे शरीर में नाड़ियों से होकर प्रवाहित होती हैं। वैसे शास्त्र हमारे शरीर में 72000 नाड़ियों की स्थिति बताते हैं, जिनमें से 10 मुख्य है:- इडा, पिंगला, सुषुम्ना, गांधारी, हस्तिजिह्वा, पूषा, यशस्विनी, अलम्बुषा, कुहू और शंखिनी।

शिव स्वरोदय में श्लोक संख्या 38 से 40 तक इन नाड़ियों का विवरण दिया गया हैं।

इडा वामे स्थिता भागे पिंगला दक्षिणे स्मृता।

सुषुम्ना मध्यदेशे तु गांधारी वामचक्षुषि॥

दक्षिणे हस्तिजिह्वा च पूषा कर्णे च दक्षिणे।

यशस्विनी वामकर्णे आनने चाप्यलम्बुषा॥

कुहूश्च लिंगदेशे तु मूलस्थाने तु शंखिनी।

एवं द्वारं समाश्रित्य तिष्ठन्ति दशनाडिका:॥

उपर्यक्त श्लोकों पर इन नाड़ियों की स्थिति शरीर के दस द्वारों (Openings)- दो नाक, दो ऑंखें, दो कान, मुख, जननेंद्रिय और गुदा उल्लिखित हैं उक्त विवरण निम्नलिखित सारिणी में स्पष्ट किया जाता है:-

नाड़ी इडा पिंगला सुषुम्ना गांधारी हस्ति- जिहवा पूषा यशस्विनी अलम्बुषा कुहू शंखिनी
स्थिति वाम (नासिक) दाहिनी नासिका मध्य (दोनों नासिका) बायाँ नेत्र दाहिना नेत्र दाहिना कान बायाँ कान मुख जननेंद्रिय गुदा

(वस्ति)

इन दस नाड़ियों में प्रथम तीन अर्थात् इड़ा, पिंगला और सुषुम्ना प्रधान हैं। इड़ा और पिंगला नाड़ियाँ क्रमश: चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी के नाम से भी जानी जाती हैं। इड़ा ऋणात्मक और पिंगला धनात्मक नाड़ी कही गयी है। मेरेडियनोलाजी में शायद इन्हें ही यिन और यंग के नाम से जाना जाता है। सुषुम्ना उदासीन होती है।

हमारी साँसें दोनों नासिकाओं से हमेशा नहीं चलतीं। ये कभी बायीं नासिका से तो कभी दाहिनी नासिका से चलती है। जब साँस बायीं नासिका से चलती है तो उसे इड़ा या चन्द्र स्वर कहते हैं तथा जब दाहिनी नासिका से चलती है तो पिंगला या सूर्य स्वर कहते हैं। जब इनका क्रम एक नासिका से दूसरी नासिका में परिवर्तित होना होता है तो उस समय थोड़ी देर के लिए दोनों नासिकाओं से साँस समान रूप से चलती है और तब उसे सुषुम्ना स्वर कहा जाता है। लगभग एक घंटा साँस बाई नासिका से और फिर एक घंटा दाहिनी नासिका से चलती हैं और इस प्रकार इनका क्रम एक-एक घंटें पर बदलता रहता है। चन्द्र स्वर की प्रकृति शीतल और सूर्य नाड़ी की प्रकृति उष्ण होती है। इनका प्रवाह क्रम चन्द्रमास (Lunar Month) का अनुसरण करता है। अर्थात् शुक्ल पक्ष की प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया को सूर्योदय के समय बायीं नासिका से साँस चलती है और एक घंटें बाद फिर एक घंटें तक दाहिनी नाक से साँस चलती है। इस प्रकार इनका क्रम घंटें-घंटें पर बदलता रहता है। इसके बाद तीन दिन तक अर्थात् चतुर्थी, पंचमी और षष्ठी को सूर्योदय के समय दाहिनी नासिका से साँस चलती है और फिर ऊपर कहे अनुसार घंटें-घंटें पर इनका क्रम बदलता रहता है। इस प्रकार तीन-तीन दिन के बाद सूर्योदय के समय इनका क्रम बदलता रहता है। कृष्ण पक्ष में यह क्रम उलट जाता है, अर्थात् पहले तीन दिन प्रतिपदा, द्वितीया और तृतीया के दिन प्रात: सूर्योदय के समय सूर्य स्वर प्रवाहित होता है। फिर तीन दिनों बाद चन्द्र स्वर तीन दिन तक चलता है और प्रतिदिन घंटें-घंटें पर इनका क्रम बदलता रहता है। नीचे की सारिणी में चन्द्रमास की तिथियों के अनुसार इसका विवरण दिया जा रहा है।

चन्द्र स्वर शुक्ल पक्ष प्रतिपदा,
द्वितीया,
तृतीया,
सप्तमी,
अष्टमी,
नवमी,
त्रयोदशी,
चर्तुदशी,
पूर्णिमा
कृष्ण पक्ष चतुर्थी, पंचमी, षष्ठी, दशमी, एकादशी, द्वादशी
सूर्य स्वर शुक्ल पक्ष चतुर्थी,
पंचमी,
षष्ठी,
दशमी,
एकादशी,
द्वादशी
कृष्ण पक्ष प्रतिपदा, द्वितीया, तृतीया, सप्तमी, अष्टमी, नवमी, त्रयोदशी, चतुर्दशी, अमावस्या

स्वामी राम ने अपनी पुस्तक Path of Fire and Light में चन्द्र स्वर और सूर्य स्वर की अवधि एक-एक घंटें के स्थान पर दो-दो घंटें लिखा है। सम्भवत: उन्होंने अपनी उक्त पुस्तक में जिस गुहय तांत्रिक ग्रंथ ”स्वर विवरण” का उल्लेख किया है उसमें इस प्रकार का वर्णन हुआ हो। हालांकि उन्होंने इसके साथ यह भी लिखा है कि स्वरों में उक्त लयबध्दता पूर्णरूपेण तभी आती है जब व्यक्ति प्राणायाम का अभ्यास करता हो। शेष तथ्य लगभग अन्य स्वरोदय ग्रंथों के समान हैं।

कहा गया है कि शुक्ल पक्ष में सोमवार, बुधवार, गुरूवार और शुक्रवार को चन्द्रनाड़ी अधिक प्रभावशाली होती है और इसके प्रवाह काल में किया गया कार्य सफल होता है। वैसे ही कृष्ण पक्ष में मंगलवार, शनिवार और रविवार को सूर्य स्वर (नाड़ी) प्रभावशाली होता है और इस अवधि (सूर्य स्वर के प्रवाह काल) में किए गए कार्य प्राय: फलदायी होते हैं। वैसे, शुक्ल पक्ष में चन्द्र स्वर और कृष्ण पक्ष में सूर्य स्वर प्रभावशाली होते हैं।

जैसे सूर्य और चन्द्र इस जगत को प्रभावित करते हैं, वैसे ही सूर्य स्वर और चन्द्र स्वर हमारे शरीर को प्रभावित करते हैं। कहा जाता है कि चन्द्र स्वर शरीर को अमृत से सींचता हैं और सूर्य स्वर उसकी नमी को सुखा देता है। जब दोनों स्वर मूलाधार चक्र, जहाँ कुण्डलिनी शक्ति सोती है, पर मिलते हैं तो उसे अमावस्या की संज्ञा दी गई है।

प्रकृति द्वारा प्रदत्त शरीर में स्वर पद्धति के अनुसार चौबीस घंटें में इनका बारह राशियों से सम्बन्ध का ज्ञान भी बड़ा रोचक है। चन्द्र स्वर का उदय वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियों में होता है तथा सूर्य स्वर का मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुंभ राशियों में। स्वरोदय विज्ञान के साधक स्वरों की प्राकृतिक पद्धति को बदल देते हैं और सूर्योदय से सूर्यास्त तक चन्द्र स्वर तथा सूर्यास्त से सूर्योदय तक सूर्य स्वर प्रवाहित करते हैं। शास्त्र कहते हैं कि जो ऐसा करने में सक्षम होता है वह योगी है।

एक दिन में साँस की छ: ऋतुएं होती हैं। प्रात:काल बसन्त है, मध्याह्न ग्रीष्म, अपराह्न वर्षा, सांयकाल शरद, मध्यरात्रि शीत और रात्रि का आखिरी हिस्सा हेमन्त ऋतु कहलाती है।

ये स्वर पाँच महाभूतों को अपने में धारण किए रहते हैं या यों कहा जाए कि पंच महाभूत एक निश्चित क्रम में नियत अवधि तक चन्द्र और सूर्य स्वर में प्रवाहित होते हैं। इसके पहले कि इस विषय पर चर्चा की जाये, यौगिक दृष्टि से शरीर विज्ञान पर थोड़ी चर्चा आवश्यक है। हमारे शरीर में स्थित शक्ति-केन्द्र, जिन्हें योग में चक्र, आधार या कुण्ड के नाम से जाना जाता है, के विषय में प्रसंगवश यहाँ परिचय दिया जा रहा है। वैसे तो शरीर में अनेक चक्र हैं, किन्तु इनमें सात-मूलाधार, स्वाधिष्ठान, मणिपुर, अनाहत विशुद्ध, आज्ञा और सहस्रार चक्र मुख्य हैं। पंच महाभूतों की स्थिति क्रम से प्रथम पाँच चक्रों में मानी जाती है, जिसका विवरण नीचे देखा जा सकता है:-

चक्र मूलाधार स्वाधिष्ठान मणिपुर अनाहत विशुद्ध
पंच महाभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश

स्वरोदय विज्ञान के अनुसार पंच महाभूतों की स्थिति उपर्युक्त स्थिति से थोड़ी भिन्न है। शिव स्वरोदय के अनुसार पृथ्वी जंघों में, जल तत्व पैरों में, अग्नि दोनों कंधों में, वायु नाभि में और आकाश मस्तक में स्थित हैं। स्वामी राम के अनुसार पृथ्वी पैरों (Feet) में, जल घुटनों में, अग्नि दोनों कंधों के बीच में स्थित हैं। शेष दो तत्वों की स्थिति के विषय में कोई अन्तर नहीं है। उक्त विवरण एक दृष्टि में नीचे की सारिणी में दर्शाया जा रहा है:-

पंच महाभूत पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश
स्थिति जंघा पैर कंधें नाभि मस्तक

ये पाँचों तत्व दोनों स्वरों में समान रूप से प्रवाहित होते हैं। यदि हम शारीरिक और मानिसिक रूप से स्वस्थ हैं तो इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि और क्रम निश्चित होते है, इन्हीं की सहायता से स्वरों में तत्वों की पहिचान की जाती है। इनकी दिशा, लम्बाई, अवधि एवं इनके प्रवाह का क्रम नीचे की सारिणी में देखा जा सकता है।

तत्व पृथ्वी जल अग्नि वायु आकाश
प्रवाह की दिशा मध्य नीचे की ओर ऊपर की ओर तिरछी

(न्यून कोण)

सभी दिशाओं में
लम्बाई 12 अंगुल 16 अंगुल 4 अंगुल 8 अंगुल
अवधि 20 मिनट 16 मिनट 12 मिनट 8 मिनट 4 मिनट
प्रवाह का क्रम तृतीय चतुर्थ द्वितीय प्रथम पंचम

पिंगला नाड़ी से स्वर प्रवाहित होने पर पृथ्वी तत्व का सूर्य से, जल का शनि से, अग्नि का मंगल से और वायु का राहु से सम्बन्ध माना जाता है तथा इड़ा नाड़ी में पृथ्वी का गुरू से, जल का चन्द्रमा से, अग्नि का शुक्र से और वायु का बुध से।

तत्वों के स्वरों में उदय के समय इन्हें पहचानने की एक और बड़ी रोचक युक्ति बताई गई है। इसके अनुसार यदि दर्पण पर अपनी श्वास प्रवाहित की जाये तो उसके वाष्प से आकृति बनती है उससे हम स्वर में प्रवाहित होने वाले तत्व को पहचान सकते हैं। पृथ्वी तत्व के प्रवाह काल में आयत की सी आकृति बनती हैं, जल तत्व में अर्ध्द चन्द्राकार, अग्नि तत्व में त्रिकोणात्मक आकृति, वायु के प्रवाह के समय कोई निश्चित आकृति नहीं बनती। केवल वाष्प के कण बिखरे से दिखते हैं।

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