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में यूं तो शुद्धि क्रियाएं अनेक हैं किंतु मुख्यत: नौ का यहां वर्णन किया जाता हैं- नेती, धौति, बस्ती, न्यौली, त्राटक, कपालभाति, धौंकनी, बाधी, शंख प्रक्षालयन। उक्त क्रियाओं को किसी योग शिक्षक के सानिध्य में रहकर ही सिखा जा सकता है। योगाभ्यास के आरंभ में सर्वप्रथम इन क्रियाओं का अभ्यास कर इन्हें सिद्ध कर लेना चाहिए। इससे योगाभ्यास का शत-प्रतिशत लाभ प्राप्त होता है। इसे मन से करने का प्रयास नहीं करना चाहिए। उक्त क्रियाओं का वर्णन इस प्रकार है-
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नेती : महीन सूत की डोरी बनाएँ, जिसकी लंबाई बारह इंच हो। इसको गरम पानी में भिगोकर, एक सिरे पर थोड़ा-सा मोम लगाकर, प्रातःकाल नित्यक्रिया के बाद एक खुले स्थान में बैठकर डोरी का मोम वाला सिरा नाक के एक छेद में धीरे-धीरे घुसाकर नीचे-ऊपर दो-चार बार खींचना चाहिए और फिर मुँह से निकाल लेना चाहिए। इसी प्रकार दूसरे नाक के छेद से भी करनी चाहिए। इस प्रकार प्रतिदिन यह नेती क्रिया करनी चाहिए।

इसका लाभ : इस नेती क्रिया के अभ्यास से नासिका मार्ग की सफाई तो होती ही है साथ ही इसके नियमित अभ्यास से कान, नाक, दाँत आदि में किसी भी प्राकार का कोई रोग नहीं होता और आँख की दृष्टि भी तेज हो जाती है।

धौति : महीन कपड़े की चार अंगुल चौड़ी और सोलह हाथ लंबी पट्टी तैयार कर उसे गरम पानी में उबाल कर धीरे-धीरे खाना चाहिए। खाते-खाते जब पंद्रह हाथ कपड़ा कण्ठ मार्ग से पेट में चला जाए, मात्र एक हाथ बाहर रहे, तब पेट को थोड़ा चलाकर, पुनः धीरे-धीरे उसे पेट से निकाल देना चाहिए।

इसका लाभ : इस क्रिया का प्रतिदिन अभ्यास करने से किसी भी प्रकार का चर्म रोग कभी नहीं होता। पित और कफ संबंधी सभी रोग दूर हो जाते हैं तथा संपूर्ण शरीर शुद्ध हो जाता है।

बस्ती : योगानुसार बस्ती करने के लिए पहले गणेशक्रिया का अभ्यास करना आवश्यक है। गणेशक्रिया में अपना मध्यम अंगुली में तेल चुपड़कर उसे गुदा- मार्ग में डालकर बार-बार घुमाते हैं। इससे गुदा-मार्ग की गंदगी दूर हो जाती है और गुदा संकोचन और प्रसार का भी अभ्यास हो जाता है।

जब यह अभ्यास हो जाए, तब किसी तालाब में जाकर कमर तक पानी में खड़े होकर घुटने को थोड़ा आगे की ओर मोड़कर दोनों हाथों को घुटनों पर दृढ़ता से रखकर फिर गुदा मार्ग से पानी ऊपर की ओर खींचे। पेट में जब पानी भर जाए तब पेट को थोड़ा इधर-उधर घुमाकर, पुनः गुदा मार्ग से पूरा पानी निकाल दें।

इसका लाभ : यह क्रिया किसी जानकार व्यक्ति के निर्देशन में ही करना चाहिए। इसके अभ्यास से शरीर शुद्ध तो होता ही है, विशेष लाभ यह है कि लिंग-गुदा आदि के सभी रोग सर्वथा समाप्त हो जाते हैं।

न्यौली : पद्मासन लगाकर दोनों हाथों से दोनों घुटनों को दबाकर रखते हुए शरीर सीधा रखें। इसके बाद पूरा श्वास बाहर निकालकर खाली पेट की मांसपेशियों को ढीला रखते हुए अंदर की ओर खींचे। इसके बाद स्नायुओं को ढीला रखते हुए पेट को दाईं-बाईं ओर घुमाएँ।

इसका लाभ : इससे पेट में गंदगी नहीं रह पाती और पेट संबंधी सभी रोग भी इससे दूर होते हैं। गर्मी संबंधी सभी रोग, वायु, गोला, सभी प्रकार के दर्द आदि भी इससे दूर होत जाते हैं। सीखते समय जानकार व्यक्ति के निर्देशन में ही इसे सीखना चाहिए।

क्रिया : त्राटक क्रिया के बारे में सभी जानते हैं। दोनों आँखों को किसी एक सूक्ष्म बिंदू पर पर्याप्त समय तक बिना पलक झपकाएँ स्थिर रखने का अभ्यास करें। अधिक देर तक एक-सा करने पर आँखों से आँसू निकलने लगते हैं। ऐसा जब हो, तब आँखें झपककर अभ्यास छोड़ दें। इस प्रकार बार-बार अभ्यास करना चाहिए।
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इसका लाभ : कहीं-कहीं दृष्टि का भूमध्य स्थान पर भी स्थिर किया जाता है। इस त्राटक क्रिया से दृष्टि स्थिर होती है। आँख के सभी रोग छूट जाते हैं। यह क्रिया भी किसी शिक्षक से सीखनी चाहिए।

कपालभाति : पद्मासन में दोनों हाथों से घुटनों को दबाकर शरीर सीधा रखते हुए झटके से बार-बार श्वास छोड़ें। श्वास लेने ‍की क्रिया अपने आप होती है। श्वास छोड़ने की गति एक मिनट में एक सौ बीस होनी चाहिए।

इसका लाभ : इसके नियमित अभ्यास से श्वास नलिका शुद्ध होती है। पेट के रोग दूर होते हैं, पाचन शक्ति बढ़ जाती है और शरीर संबंधी सभी रोग दूर हो जाने से कपाल में चमक आ जाती है। इस क्रिया को भी किसी योग शिक्षक से पूछकर ही करना चाहिए।

धौंकनी : कपालभाति के समान ही यह भी एक हठयोग की प्राचीन क्रिया है। इनमें लेना-छोड़ना दोनों झटके से बार-बार किया जाता है। आजकल इसका अधिक प्रचलन नहीं है और इसके स्थान पर कपालभाति से ही काम चलाया जाता है, लेकिन यह क्रिया भी कपालभाति की तरह लाभदायक हैं।

बाधी : बाघ आदि जानवर अस्वस्थ होने पर इसी प्रकार की क्रिया से स्वास्थ्य लाभ लेते हैं। इसलिए इसका नाम बाधी क्रिया दिया गया है। भोजन के दो घंटे बाद जब आधी पाचन क्रिया हुई होती है, दो अंगुली गले में डालकर वमन किया जाता है जिससे कि वह अधपचा अन्न बाहर निकल जाता है। इसे ही बाधी क्रिया कहा जाता है।

इसका लाभ : इससे पेट की सभी प्रकार की गंदगी या कफ आदि उस अधपचे अन्न के साथ निकल जाती है। फलतः पेट संबंधी शिकायतें दूर होती हैं।

: शंख बजाने के बाद जैसे उसे पानी से धोकर रखते हैं, उसी प्रकार शंख के बनावट वाली गुदा मार्ग के द्वारा पेट को धोकर साफ किए जाने के कारण इस शुद्धि क्रिया का नाम शंख प्रक्षालन पड़ा है।

इसके अभ्यास के लिए पूरे एक दिन की आवश्यकता होती है। जिस दिन यह अभ्यास करना हो उस दिन प्रातःकाल नित्यक्रिया से निवृत्त हो गुनगुना पानी दो-तीन या चार गिलास पीने के बाद वक्रासन, सर्पासन, कटिचक्रासन, विपरीतकरणी, उड्डियान एवं नौली का अभ्यास करें। इससे अपने आप शौच का वेग आता है।

शौच से आने पर पुनः उसी प्रकार पानी पीकर उक्त आसनादिकों का अभ्यास कर शौच को जाएँ। इस प्रकार बार-बार पानी पीना, आसनादि करना तथा शौच को जाना सात-आठ बार हो जाने पर अंत में जैसा पानी पीते हैं, वैसा ही पानी जब स्वच्छ रूप से शौच में निकलता है, तब पेट पूरा का पूरा धुलकर साफ हो जाता है।

इसके बाद कुछ विश्राम कर ढीली खिचड़ी, घी, हल्का-सा खाकर पूरा दिन लेटकर आराम किया जाता है। दूसरे दिन से सभी काम पूर्ववत करते रहें। इस क्रिया को दो-तीन महीने में एक बार करने की आवश्यकता होती है।

इसका लाभ : इस क्रिया के करने से शरीर में एक नई स्फूर्ति और जीवन का संचार होता है। मन प्रसन्न रहता है तथा शरीर में नयापन व हल्कापन का अनुभव महीनों तक बना रहता है।

संपूर्ण क्रिया के लाभ और प्रभाव : हठयोग के शुद्धि क्रियाओं के अभ्यास से संपूर्ण शरीर को शुद्ध किया जा सकता है। इससे बुद्धि उज्जवल हो जाती है और शरीर बलवान बनकर सदा स्फूर्तिदायक बना रहता है। इन क्रियाओं से किसी भी प्रकार की गंदगी शरीर में स्थान नहीं बना पाती है और फलतः जीवन में कभी भी किसी भी प्रकार का कोई भी रोग नहीं होता।

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