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दो अलग-अलग विचारधाराओं की नदियां है। इनका संगम लगभग नामुमकिन है, किन्तु यह भी सच है कि अगर संगम हो जाता है, तो यकीनन देश के  राजनीतिक सागर में तूफ़ान आ जाएगा। यह किसी ग्लेशियर के पिघलने जैसा है, जो कांग्रेस के खात्मे के लिए काफी है। अगर आप राजनीतिक समीकरणों की बात करें तो कुछ भी संभव है। समीकरण प्रतिपल बदलते हैं, और प्रतिपल राजनीतिक पार्टियां अपना-अपना दांव खेलती नज़र आती है।

दरअसल, यह सारी मशक्कत सत्तासीन होने की है। जनता के मध्य दुविधाएं हों या न हो ऐन  चुनावों में अगर किसी धुर विरोधी पार्टी की गलबहियां देखने को मिल जाती है, तो इस पर आश्चर्य नहीं किया जाना चाहिए, क्योंकि राजनीतिक समुद्र में यह सब चलता रहता है।

यकीनन, देश का इतिहास रहा है कि यहां स्वार्थ सिद्ध करने के लिए ऐसे-ऐसे गठबंधन हो गए और टूट गए, जिन पर आश्चर्य व्यक्त किया जाता रहा मगर राजनीतिक बिसात पर ऐसी चालें देखने को मिल जाना सामान्य सी बात है।
इसलिए BJP संग जा सकते हैं ओवैसी, ये है BJP-MIM गठजोड़ का पूरा सच..!

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बहरहाल, एक ऐसे राजनीतिक समीकरण की चर्चा इन दिनों सुगबुगाहट के रूप में हवा में तैरने लगी है जो आपको हैरान कर देगी। जी हां, ये है ओवैसी बंधू और मोदी के बीच दोस्ती की। भाजपा और एआईएमआईएम के मध्य तेवर थोड़े ढीले पड़ते नजर आने लगे हैं। हालांकि भाजपा की ओर से ऐसे कोई संकेत देखने को नहीं मिले किन्तु बिहार विधानसभा चुनावों के दौरान ओवैसी द्वारा चुनाव लड़ना भाजपा को फ़ायदा पहुंचाने के तौर  पर देखा गया था।

हालांकि चुनाव परिणामों के पश्चात् ऐसा कुछ देखने को नहीं मिला कि ओवैसी के चुनाव मैदान में कूदने से भाजपा को फ़ायदा हुआ हो। फिर भी ओवैसी के इस कदम ने भाजपा के लिए उनका सॉफ्टकॉर्नर चेहरा दिखाया था। आसन्न यूपी चुनावों में भी ओवैसी ने मैदान में उतरने का संकेत दे ही दिया है।

कभी मायावती के साथ मिलकर लड़ने की बात सामने आती है, तो कभी अकेले ही मैदान में उतरने की मंशा, किन्तु इधर जब अकबरुद्दीन ओवैसी के एक भाषण के दौरान जिस बात की चर्चा है, उसने अन्य पार्टियों के होश तो उड़ा ही दिए हैं।

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