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आदौ   चन्द्रः   सिते   पक्षे   भास्करो   हि     सितेतरे।
प्रतिपत्तो हि दिनान्याहुस्त्रिणित्रिणि कृतोदयः।।62।।

अन्वयः सिते पक्षे आदौ चन्द्रः सितेतरे हि भास्करः।
प्रतिपत्तो त्रिणि-त्रिणि दिनानि कृतोदयः आहुः।
भावार्थ- शुक्ल पक्ष में प्रथम तीन दिन सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर प्रवाहित होता है और कृष्ण पक्ष में सूर्य स्वर और तीन-तीन दिन पर इनके उदय का क्रम बदलता रहता है। इस प्रकार स्वरोदय काल का क्रम समझना चाहिए।

सार्धद्विघटिके ज्ञेयः शुक्ले कृष्णे शशी रविः।
वहत्यैकदिनेनैव यथा षष्टिघटी क्रमात्।।63।।

अन्वयः शुक्ले शशी कृष्णे रविः षष्टिघटीक्रमात्
सार्धद्विघटिके एक दिनेन एव वहति (इति) ज्ञेतः।
भावार्थः पिछले श्लोक में बताए गए क्रम से शुक्ल पक्ष में चन्द्र स्वर और कृष्ण पक्ष में सूर्य स्वर प्रतिदिन क्रम से ढाई-ढाई घटी अर्थात एक-एक घंटे साठ घटियों में प्रवाहित होते हैं यदि उनमें किसी प्रकार का अवरोध न किया जाए। घटी के हिसाब से साठ घटी का दिन-रात होता है। इस प्रकार ढाई घटी का एक घंटा होता है।

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वहेयुस्तद्घटीमध्ये  पञ्चतत्त्वानि  निर्देशयेत्।
प्रतिपत्तो दिनान्याहुर्विपरीते विवर्जयेत्।।64।।

अन्वय :- तदघटीमध्ये पंचतत्त्वानि वहेयुः।
प्रतिपत्तो दिनानि निर्देशयेत् विपरीते (तु) विवर्जयेत् (इति) आहुः।
भावार्थः प्रत्येक नाड़ी के एक घंटे के प्रवाह काल में पाँचो तत्त्वों- पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु और आकाश का उदय होता है। यदि उपर्युक्त श्लोकों में बताए गए क्रम से प्रातःकाल स्वरों का क्रम न हो तो उन्हें परिवर्तित कर ठीक कर लेनाचाहिए, अन्यथा कोई भी शुभ कार्य नहीं करना चाहिए।

शुक्लपक्षे   भवेद्वामा   कृष्णपक्षे      दक्षिणा।
जानीयात्प्रतिपत्पूर्वं योगी तद्यतमानसः।।65।।

अन्यव :- शुक्लपक्षे वामाभवेद् कृष्णपक्षे च दक्षिणा
प्रतिपत्पूर्वं तद् मानसः योगी जानीयात्।
भावार्थः शुक्लपक्ष की प्रतिपदा को इड़ा तथा कृष्ण-पक्ष की प्रतिपदा को पिंगला नाड़ी चलनी चाहिए। तब योगी को दत्तचित्त होकर कार्य करना चाहिए। उसमें उसे सफलता मिलती है।

शशाङ्कं     वारयेद्रात्रौ     दिवा      वारयेत्भास्करम्।
इत्याभ्यासरतो नित्यं स योगी नात्र संशयः।।66।।

अन्वय :- (यः) रात्रौ शशाङ्कं वारयेत् दिवा (च) भास्करं वारयेत् सः योगी, न अत्रसंशयः।
भावार्थःरात में चन्द्रनाड़ी और दिन में सूर्यनाड़ी को रोकने में जो सफल हो जाता है वह निस्सन्देह योगी है।

सूर्येण     बध्यते     सूर्यः     चन्द्रश्चन्द्रेण     बध्यते।
यो जानाति क्रियामेतां त्रैलोक्यं वशगं क्षणात्।।67।।

अन्यवः सूर्येण सूर्यः बध्यते चन्देण च चन्द्रः बध्यते,
यः एतां क्रियां जानाति(तस्य) त्रैलोक्यं क्षणात् वशगं (भवेत्)।
भावार्थ- सूर्यनाड़ी द्वारा अर्थात् पिंगला नाड़ी द्वारा सूर्य को अर्थात् शरीर में स्थित प्राण ऊर्जा को नियंत्रित किया जाता है तथा चन्द्र नाड़ी अर्थात् इड़ा नाड़ी द्वारा चन्द्रमा को वश में किया जा सकता है। यहाँ चन्द्रमा मन का संकेतक है। अर्थात् इडा द्वारा मन को नियंत्रित किया जाता है। इस क्रिया को जो जानता है और उसका अभ्यास करके दक्षता प्राप्त कर लेता है, वह तत्क्षण, तीनों लोकों का स्वामी बन जाता है।

उदयं       चन्द्रमार्गेण      सूर्येणास्तमनं      यदि।
तदा ते गुणसंघाता विपरीतं तु विवर्जयेत्।।68।।

अन्वयः यदि चन्द्रमार्गेण उदयं सूर्येण (च) अस्तमनं (भवेत्)
तदा ते (नाड्यो) गुण संघाता, (परन्तु) विपरीतं विवर्जयेत्।
भावार्थ- यदि चन्द्र नाड़ी में स्वर का उदय हो और सूर्यनाड़ी में उसका समापन हो, तो ऐसी स्थिति में मिली सम्पति कल्याणकारी होती है। परन्तु यदि स्वरों का क्रम उल्टा हो, तो कोई लाभ नहीं मिलेगा। अतएव उसे छोड़ देना चाहिए।

गुरुशुक्रबुधेन्दूनां वासरे वामनाडिका।
सिद्धिदा सर्वकार्येषु शुक्लपक्षे विशेषतः।।69।।

अन्वय- शुक्लपक्षे विशेषतः गुरुशुक्रबुधेन्दूनां वासरे वामनाडिकासर्वकार्येषु सिद्धिदा (भवति)।
भावार्थः शुक्ल पक्ष में विशेषकर सोम, बुध, गुरु और शुक्रवार को चन्द्रनाड़ी अर्थात् वायीं नासिका से स्वर के प्रवाह काल में किए गए सभी कार्यों में सफलता मिलती है।

अर्काङ्गारकसौरीणां वासरे दक्षनाडिका।
स्मर्तव्या चरकार्येषु कृष्णपक्षे विशेषतः।।70।।

अन्वयः कृष्णपक्षे विशेषतः अर्काङ्गारकसौरीणां वासरे चरकार्येषु दक्षनाडिका स्मर्तव्या।
भावार्थः कृष्ण पक्ष में विशेषकर रवि, मंगल और शनिवार को सूर्यनाडी के प्रवाह काल में किए गए अस्थायी फलदायक कार्यों में सफलता मिलती है।

प्रथमं वहते वायुः द्वितीयं च तथानलः।
तृतीयं वहते भूमिश्चतुर्थं वरुणो वहेत्।।71।।

अन्वयः प्रथम वायुः वहते द्वितीयं च तथानलः तृतीयं भूमिः वहते चतुर्थं वारुणो वहेत्।
भावार्थः यहाँ प्रत्येक नाड़ी के प्रवाह में पंच महाभूतों के उदय का क्रम बताया गया है, अर्थात् स्वर प्रवाह के प्रारम्भ में वायु तत्त्व का उदय होता है, तत्पश्चात् अग्नितत्त्व, फिर पृथ्वी तत्त्व, इसके बाद जल तत्त्व और अन्त में आकाश तत्त्व का उदय होता है।

सार्धद्विघटिके पंचक्रमेणैवोदयन्ति च।
क्रमादेकैकनाड्यां च तत्त्वानां पृथगुद्भवः।।72।।

अन्वयः श्लोक अन्वित क्रम में है। इसलिए इसके अन्वय की आवश्यकता नहीं है।
भावार्थः जैसा कि तिरसठवें श्लोक में आया है कि हर नाड़ी में स्वरों का प्रवाह ढाई घटी अर्थात् एक घंटे का होता है। इस ढाई घटी या एक घंटे के प्रवाह-काल में पाँचों तत्त्व पिछले श्लोक में बताए गए क्रम से उदित होते हैं। इन तत्त्वों का प्रत्येक नाड़ी में अलग-अलग अर्थात् चन्द्र नाड़ी और सूर्य नाड़ी दोनों में अलग-अलग किन्तु एक ही क्रम में तत्त्वों का उदय होता है।

अहोरात्रस्य मध्ये तु ज्ञेया द्वादश संक्रमाः।
वृष-कर्कट-कन्यालि-मृग-मीना निशाकरे।।73।।

अन्वयः अहोरात्र्यस्य मध्ये तु द्वादश सङ्क्रमाः ज्ञेयाः। (तेषु) निशाकरे वृष-कर्कट-कन्यालि-मृग-मीना (राशवः वसन्ते)
भावार्थः दिन और रात, इन चौबीस घंटों में बारह संक्रम अर्थात् राशियाँ होती हैं। इनमें वृष, कर्क, कन्या, वृश्चिक, मकर और मीन राशियाँ चन्द्रनाडी में स्थित हैं।

मेषसिंहौ च कुंभश्च तुला च मिथुनं धनुम्।
उदये दक्षिणे ज्ञेयः शुभाशुभविनिर्णयः।।74।।

अन्वयः मेषसिंहौ च कुम्भश्च तुला च मिथुनं धनुं दक्षिणे उदये शुभाशुभविनिर्णयः।
भावार्थः मेष, मिथुन, सिंह, तुला, धनु और कुम्भ राशियाँ सूर्य नाड़ी में स्थित हैं। शुभ और अशुभ कार्यां के निर्णय हेतु इनका विचार करना चाहिए।

इस अंक में स्वर विशेष के प्रवाह-काल में किए जाने वाले कार्य विशेष का उल्लेख किया जा रहा है।

तिष्ठेत्पूर्वोत्तरे चन्द्रो भानु: पश्चिमदक्षिणे।

दक्षनाडया: प्रसारे तु न गच्छेद्याम्यपश्चिमे॥ (75)

अन्वय चन्द्र: पूर्वोत्तरे तिष्ठेत् भानु: पश्चिमदक्षिणे। (अतएव) दक्षनाडया: प्रसारे याम्यपश्चिमे तु न गच्छेत्।
भावार्थ चन्द्रमा का सम्बन्ध पूर्व और उत्तर दिशा से है और सूर्य का दक्षिण और पश्चिम दिशा से। अतएव दाहिनी नाक से साँस चलते समय दक्षिण और पश्चिम दिशा की यात्रा प्रारम्भ नहीं करनी चाहिए।

वमाचारप्रवाहे तु न गच्छेत्पूर्वउत्तरे।
परिपंथिभयं तस्य गतोऽसौ न निवर्तते॥ (76)

अन्वय वामाचार प्रवाहे तु पूर्वउत्तरे न गच्छेत्। (यत:) तस्य परिपंथिभयं असौ गत: न निवर्तते।
भावार्थ इडा् नाड़ी के प्रवाह के समय उत्तर एवं पूर्व दिशा की यात्रा आरम्भ नहीं करनी चाहिए। क्योंकि इड़ा के प्रवाह काल में यात्रा के आरम्भ करने पररास्ते में डाकुओं द्वारा लुटने का भय होता है या यात्रा से वह घर नहीं लौट पाता।

तत्र तस्मान्न गंतव्यं बुधै: सर्वहितैषिभि:।
तदा तत्र तु संयाते मृत्युरेव न संशय:॥ (77)

अन्वय तस्मात् बुधै: सर्वहितैषिभि: तत्र न गंतव्यम्। तदा तु संयाते मृत्यु एव न तत्र संशय:।
भावार्थ अतएव बुद्धिमान लोग सफलता पाने के उद्देश्य से वर्जित नाड़ी के प्रवाह के दौरान वर्जित दिशा की यात्रा प्रारम्भ नहीं करते, अन्यथा मृत्यु अवश्यंभावी है।

शुक्लपक्षे द्वितीयायामर्के वहति चन्द्रमा:।
दृश्यते लाभद: पुसां सौम्ये सौख्यं प्रजायते। (78)

अन्वय शुक्लपक्षे द्वितीयायाम् अर्के (यदि) चन्द्रमा वहति, पुसां सौम्ये लाभद: दृश्यते सौख्यं (च) प्रजायते।
भावार्थ यदि शुक्ल पक्ष की द्वितीया को सूर्योदय के समय चन्द्र स्वर प्रवाहित हो, तो लाभ और मित्र के मिलने की संभावना अधिक होती है।

सूर्योदये यदा सूर्यश्चन्द्रश्चन्द्रोदये भवेत्।
सिध्यन्ति सर्वकार्याणि दिवारात्रिगतान्यपि॥ (79)

अन्वय यदा सूर्योदये सूर्य: चन्द्रोदये (च) चन्द्र: भवेत्, (तदा) दिवारात्रिगतान्यपि सर्वाणि कार्याणि सिध्यन्ति।
भावार्थ जब सूर्योदय के समय सूर्य स्वर और चन्द्रोदय के समय चन्द्र स्वर बहे, तो उस दिन किए गए सभी कार्य सफल होते हैं।

चन्द्रकाले यदा सूर्यश्चन्द्र: सूर्योदये भवेत्।
उद्वेग: कलहो हानि: शुभं सर्व निवारयेत्॥ (80)

अन्वय यदा चन्द्रकाले सूर्य: सूर्योदये चन्द्र: भवेत् (तदा) उद्वेग:, कलह:, हानि: (भवेत्) शुभं सर्वं निवारयेत्।
भावार्थ लेकिन जब सूर्योदय के समय चन्द्र नाड़ी और चन्द्रोदय के समय सूर्य नाड़ी प्रवाहित हो, तो उस दिन किए सारे कार्य संघर्षपूर्ण और निष्फल होते हैं।

सूर्यस्यवाहे प्रवदन्ति विज्ञा: ज्ञानं ह्रगमस्य तु निश्चयेन।
श्वासेन युक्तस्य तु शीतरश्मे:, प्रवाहकाले फलमन्यथा स्यात्॥ (81)

अन्वय विज्ञा: अगमस्य हिज्ञानं प्रवदन्ति (यत्) सूर्य वाहे निश्चयेन (किन्तु) शीतरश्मे: श्वासेन युक्तस्य प्रवाहकाले अन्यथा फलं स्यात्॥
भावार्थ विद्वान लोग कहते हैं कि सूर्य स्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में अभूतपूर्व सफलता मिलती है, जबकि चन्द्रस्वर के प्रवाह काल में किए गए कार्यों में ऐसा कुछ नहीं होता।

इस अंक का प्रतिपाद्य विषय है कि यदि नियत तिथि को प्रात:काल नियत स्वर प्रवाहित न हो तो किस प्रकार के दुष्परिणाम सामने आते हैं या आने की संभावना बनती है।

यदा प्रत्यूषकालेन विपरीतोदयो भवेत्।
चन्द्रस्थाने वहत्यर्को रविस्थाने च चन्द्रमा:॥ (82)

अन्वय यदा प्रत्यूषकालेन विपरीतोदय: भवेत् (अर्थात्) चन्द्रस्थाने अर्क: वहति रविस्थाने चन्द्रमा: च।

प्रथमे मन उद्वेगं धनहानिर्द्वितीयके।
तृतीये गमनं प्रोक्तमिष्टनाशं चतुर्थके ॥ (83)

अन्वय प्रथमे मन-उद्वेगं द्वितीयके धनहानि: तृतीय गमनं प्रोक्तं चतुर्थक इष्टनाशम्।

पंचमे राज्य-विध्वंसं षष्ठे सर्वार्थनाशनम्।
सप्तमे व्याधिदु:खानि अष्टमे मृत्युमादिशेत्॥ (84)

अन्वय यह श्लोक अन्वित क्रम होने से अन्वय नहीं दिया जा रहा है।
भावार्थ समझने की सुविधा हेतु तीनों श्लोकों का भावार्थ एक साथ दिया जा रहा है।
प्रात: काल में (सूर्योदय के समय) यदि विपरीत स्वर प्रवाहित होता है, अर्थात् प्रात:काल सूर्य स्वर के स्थान पर चन्द्र स्वर प्रवाहित हो और चन्द्र स्वर के स्थान पर सूर्य स्वर प्रवाहित हो, तो प्रथम काल खण्ड में मानसिक चंचलता होती है, दूसरे कालखण्ड में धनहानि, तीसरे में यात्रा (अनचाही) चौथे में असफलता, पॉचवें में राज्य विध्वंस, छठवें में सर्वनाश, सातवें में शरीरव्याधि और कष्ट तथा आठवें कालखण्ड में मृत्यु। (82 – 84 श्लोक)

कालत्रये दिनान्यष्टौ विपरीतं यदा वहेत्।
तदा दुष्टफलं प्रोक्तं किंचिन्यूनं तु शोभनम॥ (85)

अन्वय यह श्लोक भी अन्विति क्रम में है, अतएव इसका अन्वय नहीं दिया जा रहा है।
भावार्थ आठ दिनों तक निरन्तर प्रात:, दोपहर और सायंकाल यदि विपरीत स्वर चले, तो सभी कार्यों में असफलता मिलती है और कीर्ति लेशमात्र भी नहीं मिलती।

प्रातर्मध्याहृयोश्चन्द: सांयकाले दिवाकर:।
तदा नित्यं जयो लाभो विपरीतं विवर्जयेत्॥ (86)

अन्वय यह श्लोक भी अन्विति क्रम में है अतएव इसका अन्वय आवश्यक नहीं है।
भावार्थ यदि सूर्योदय काल और मध्याह्न में चन्द्र स्वर और सूर्यास्त के समय सूर्य स्वर प्रवाहित हो तो उस दिन हर तरह की सफलता मिलती है। लेकिन स्वरों का क्रम यदि उल्टा हो, तो शुभ कार्यों को न करना ही बुद्धिमानी है।

वामे वा दक्षिणे वापि यत्र संक्रमते शिव:।
कृत्वा त्पादमादौ च यात्रा भवति सिद्धिदा॥ (87)

अन्वय यह श्लोक भी अन्विति क्रम में है अतएव अन्वय नहीं दिया जा रहा है।
भावार्थ यात्रा प्रारम्भ करते समय जिस नाक से साँस चल रही हो वही पैर घर से पहले निकाल कर यात्रा करनी चाहिए। इस प्रकार यात्रा निर्विघ्न सफल होती है।

चन्द्र: समपद: कार्यो रविस्तु विषम: सदा।
पूर्णपादं पुरस्कृत्य यात्रा भवति सिद्धिदा॥ (88)

अन्वय आवश्यकता नहीं है।
भावार्थ यदि चन्द्र स्वर प्रवाहित हो तो समसंख्या में तथा सूर्य स्वर के प्रवाह के समय विषम संख्या में कदम भरना चाहिए। इससे यात्रा सिद्धिप्रद होती है।

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