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नई दिल्ली। आजादी के 68 साल बाद भी कुछ “वंचितों में हालत जस के तस हैं” पर खेद जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि राष्ट्रीय हित में यह आवश्यक हो गया है कि उच्च शिक्षण संस्थाओं में सभी तरह के आरक्षण से दूर रहा जाए। शीर्षस्थ न्यायालय ने केन्द्र सरकार से यह भी कहा कि वह इस सम्बंध में “सकारात्मक” प्रभावशाली कदम उठाए। सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और तमिलनाडु में सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेज में प्रवेश को लेकर योग्यता मानकों को चुनौती देने के लिए दायर याचिकाओं पर फैसले के दौरान की। याचिकाओं में कहा गया कि इन तीन राज्यों में इस कोर्स की परीक्षा में बैठने के लिए वहां का निवासी होना चाहिए, ऎसा नियम बना रखा है।phpThumb

न्यायाधीश दीपक मिश्रा और न्यायाधीश पीसी पंत की पीठ ने कहा कि सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेस में चयन का प्रारम्भिक मापदंड मेरिट बनाने के लिए केन्द्र और राज्य सरकारों के कई बार स्मरण दिलाने के बाद भी जमीनी हालत जस के तस हैं और मेरिट पर आरक्षण का आधिपत्य रहता है। पीठ ने यह भी कहा कि विशेषाधिकारों से हालत नहीं बदले हैं। चिकित्सा संस्थानों में सुपर स्पेशयलिटी कोर्सेस में आरक्षण मुद्दे के दो मामलों पर शीर्षस्थ अदालत ने यह भी कहा कि “वास्तव में कोई आरक्षण नहीं होना चाहिए।” देश के यह सामान्य हित में है कि उच्च शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार किया जाए और उपलब्ध स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता बढ़ाकर देश के लोगों की मदद की जाए।

पीठ ने निर्णय देते हुए कहा कि उसे उम्मीद और विश्वास है कि केन्द्र सरकार और राज्यों की सरकारें इस पहलू पर बिना देरी किए गंभीरता से विचार करेंगी और समुचित दिशा-निर्देश देने की ओर बढ़ेंगी। वह आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में प्रवेश प्रक्रिया में दखल नहीं दे सकती क्योंकि राष्ट्रपति के आदेश को संवैधानिक रूप से चैलेंज नहीं किया जा सकता। हालांकि कहाकि चार नवंबर को इस पर सुनवाई की जाएगी कि तमिलनाडु में इस मामले में दखल दी जा सकती है या नहीं।

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