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संस्कृत से ही विकसित हुई हिंदी जहां अपनी शुद्धता के लिए संघर्ष कर रही है, वहीं संस्कृत अपने अस्तिव के लिए लड़ रही है। देश की सवा अरब की आबादी में गिने-चुने लोग ही संस्कृत की जानकारी रखते हैं। कई स्कूलों में छात्रों को संस्कृत तो पढ़ाई जाती है, लेकिन इसमें भविष्य न दिखता देख वे खुद ही इससे दूरियां बना लेते हैं। आज हर जगह अंग्रेजी का बोलबाला है, अगर आपको अंग्रेजी आती है, तो नौकरी मिल ही जाएगी। स्कूलों में भी इसी भाषा पर जोर दिया जा रहा है। परिवार वाले भी बच्चों से गिनतियां एक, दो, तीन में नहीं बल्कि वन, टू, थ्री में सुनना ज़्यादा पसंद करते है। उन्हें गर्व होता है, जब उनका बच्चा चार लोगों के बीच में अंग्रेजी में कविता सुना देता है। वहीं अगर हम विश्वविद्यालयों में संस्कृत की शिक्षा पर बात करें, तो आपको ऐसे बेहद कम छात्र मिलेंगे जो खुद ही इसे विषय के रूप में चुनना चाहते हैं। आज हालात ये हैं कि 50 और 40 प्रतिशत अंक पाने वाले विद्यार्थियों को किसी और विषय में सीट मिले या न मिले, पर हिंदी और संस्कृत भाषा में ज़रूर मिल जाती है। जाहिर सी बात है कि इनकी सीट खाली रहती है।

भाषा हो या बोली, सभी का अस्तित्व हमारे समाज के लिए बेहद ज़रूरी है। अगर ये खत्म हो गईं, तो भाषाओं में फैली विविधता भी समाप्त हो जाएगी। कुछ लोग जो इन भाषाओ को ज़िंदा रखने का कार्य कर रहे हैं, अब वो भी मुसीबत में हैं।

दुनिया की प्राचीनतम भाषा संस्कृत आज भारत में ही अपना अस्तित्व बचाने के लिए जूझ रही है। 47 साल से संस्कृत भाषा में प्रकाशित होने वाला ‘सुधर्मा’ समाचार पत्र खराब आर्थिक हालातों के चलते बंद होने की कगार पर आ गया है। शायद आपकी मदद से ये समाचार पत्र 14 जुलाई को अपनी 47वीं वर्षगांठ मना पाए।

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