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मित्रो महाऋषि चाणक्य का एक सूत्र है धर्मस्य मूलम अर्थम् अर्थस्य मूलम कामम !
इसका सीधा सा अर्थ है धर्म के मूल मे अर्थ (धन) है ! अर्थात अर्थ कमजोर हुआ तो
धर्म अपने आप कमजोर होता है !

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अर्थात अर्थव्यवस्था ठीक नहीं है तो धर्म पालन नहीं होता भूखे लोग मंदिर नहीं बनाते
और भूखे लोग भजन भी नहीं करते ! पेट भरा हुआ होना चाहिए समृद्धि होनी चाहिए
तब मंदिर बनते है तब मठ बनते है तब संस्थाएं बनती है और धार्मिक कार्य होते है !
अतिरिक्त धन अगर आपके पास होगा तब ही गौशालाएँ बनती है मंदिर बनते है जागरण आदि होते है,रथयात्राएं निकलती है, जिनको खुद को खाने के लाले पड़े हो वो बेचारे क्या आर्थिक दान देंगे ? और बिना अर्थ के क्या धर्म टिकेगा ??

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