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दो वर्षों में Modi ने जितनी असहिष्णुता झेली, उतनी देश में किसी ने नहीं, ऐसे चुप हुए विरोधी..!

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विदेशनीति के मोर्चे पर ताबड़तोड़ फैसले, 50 से ज्‍यादा विदेश यात्राएं, करोड़ों अरबों रुपये के निवेश में सफलता, आतंरिक सुरक्षा से लेकर बिना किसी भ्रष्टाचार के चल रही सरकार और लगातार विकासोन्‍मुखी फैसले, पिछले दो साल में किसी सरकार के लिए इससे ज्‍यादा शानदार उपलब्‍धि और क्‍या हो सकती है।

26 मई को दो साल पूरी करने जा रही सरकार के लिए सबसे प्रमुख चुनौतियां रही उसके विरोधियों द्वारा लगातार, असहिष्‍णुता, पुरस्‍कार वापसी, अभिव्‍यक्‍ति की स्‍वतंत्रता जैसे मुद्दों को उछालकर पीएम मोदी की छवि को धूमिल करने का एक बार फिर से प्रयास करना, लेकिन असफल हो जाना।

दरअसल देखा जाए तो गुजरात दंगों के बाद मिली क्‍लीन चिट के साथ ही विपक्षी और विरोधी ने पीएम मोदी को असहिष्‍णुता जैसे हवा-हवाई मुद्दे पर घेरा क्‍योंकि दूसरे मोर्चे पर सरकार इतना शानदार काम कर रही है कि उन्‍हें मोदी को घेरने के लिए कुछ मिला ही नहीं।

अब बात यदि असहिष्‍णुता की ही करें तो आपको जानकर आश्‍चर्य ही होगा कि जितनी असहिष्‍णुता खुद पीएम मोदी ने झेली है, उससे ज्‍यादा देश में आज तक किसी ने झेली। यानी असहिष्‍णुता के मुद्दे पर पीएम मोदी को घेरने वाले विरोधियों को यह पता ही नहीं लगा खुद नरेंद्र मोदी कितनी असहिष्‍णुता का शिकार हुए हैं।

एक ओर जहां कलबुर्गी की हत्या का उदाहरण देकर कई साहित्यकारों ने अपने-अपने पुरस्कार लौटाए। और कहा कि वो असहिष्णुता का शिकार हो रहे हैं। लेकिन भारत के राजनीतिक इतिहास में किसी राजनेता को असहिष्णुता का एहसास होगा वह है देश का प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

नरेंद्र मोदी पर 2002 में हुए गुजरात दंगे के बाद जितने हमले हुए उतने किसी राजनेता पर नहीं हुए होंगे। यहां तक कि 1984 में हुए सिक्ख दंगे के बाद भी किसी कांग्रेसी नेता ने इतने विरोध नहीं झेले होंगे, जिसके बाद राजीव गांधी ने कहा था कि जब बड़े वृक्ष गिरते हैं तो धरती थोड़ी कांपती है।

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