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दुर्घटना एवं महामारी को छोड़कर प्रत्येक रोग की उत्पत्ति का कारण शरीर में विजातीय दूषित द्रव्यों का जमा होना है और इन दूषित द्रव्यों के शरीर में जमा होने का कारण है रोगी द्वारा प्रकृति के विरुद्ध खान-पान एवं रहन-सहन। इस बात की पुष्टि करते हुए ऋषि चरक ने कहा हैः “समस्त रोगों का कारण कुपित हुआ मल है और उसके प्रकोप का कारण अनुचित आहार-विहार है।”

अनुचित आहार-विहार से पाचनक्रिया बिगड़ जाती है और यदि पाचनक्रिया ठीक न हो तो मल पूर्ण रूप से शरीर से बाहर नहीं निकल पाता और वही मल धीरे-धीरे शरीर में जमा होकर बीमारी का रूप ले लेता है।

जिनकी जठराग्नि मंद है, खान-पान अनुचित है, जो व्यायाम एवं उचित विश्राम नहीं करते उनके शरीर में विजातीय द्रव्य अधिक बनते हैं। मल-मूत्र, पसीने आदि के द्वारा जब पूर्ण रूप से ये विजातीय द्रव्य बाहर नहीं निकल पाते और शरीर के जिस अंग में जमा होने लगते हैं उसकी कार्यप्रणाली खराब हो जाती है। परिणामस्वरूप उससे संबंधित रोग उत्पन्न हो जाते हैं। रोगों के नाम चाहे अलग-अलग हों किन्तु सबका मूल कारण कुपित मल ही है।

तीव्र रोग

शरीर की जीवनशक्ति हमारे अंदर एकत्रित हुए मल को यत्नपूर्वक बाहर निकालकर शरीर की सफाई करने की कोशिश करती है। समस्त तीव्र रोग जैसे कि सर्दी, दस्त, कॉलरा,आँव एवं प्रत्येक प्रकार के बुखार वास्तव में शरीर से गंदे एवं विषाक्त द्रव्यों को बाहर निकालने की क्रिया है जो कि रोगरूप से प्रगट होती है। उसे ही हम तीव्र रोग कहते हैं।

जीर्ण रोग

जहरीली एवं धातुयुक्त दवाएँ लेने के कारण तीव्र रोग शरीर में ही दब जाते हैं। फलस्वरूप शरीर के किसी न किसी अंग में जमा होकर वे पुराने एवं घातक रोग का रूप ले लेते हैं। उन्हें ही जीर्ण रोग कहा जाता है।

प्राकृतिक चिकित्सा

प्राकृतिक चिकित्सा रोगों को दबाती नहीं है वरन् जड़मूल से निकालकर शरीर को पूर्णरूप से नीरोग कर देती है एवं इसमें एलोपैथी दवाइयों की तरह ‘साइड इफैक्ट’ की संभावना भी नहीं रहती। जल चिकित्सा, सूर्यचिकित्सा, मिट्टी चिकित्सा, मालिश, सेंक आदि ऐसी ही प्राकृतिक चिकित्साएँ हैं जो मनुष्य को पूरी तरह से स्वस्थ करने में पूर्णतया सक्षम हैं।

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