पेप्सी-कोक को भारत से भगाने के लिए तमिलनाडु से अभियान की हुई शुरुआत…

पेप्सी-कोक के खिलाफ तमिलनाडु से जागरण की शुरुआत…

यूनाइटेड हिन्दी : तमिलनाडु ट्रेडर्स एसोसिएशन के सभी व्यापारी एक मार्च से पेप्सी और कोक के सभी उत्पादों का बहिष्कार करने जा रहे हैं। सभी व्यापारी संगठनों ने एक बैठक में निर्णय लिया है कि पेप्सी-कोक के उत्पादों को नहीं बेचा जाएगा। यूनाइटेड हिन्दी ही जमीनी रिपोर्टर से खबर है कि विभिन्न माध्यमों द्वारा जनजागरण फैलाए जाने तथा पेयजल एवं भूमिगत जल की स्थिति दिनोंदिन ख़राब होने के बाद से जनता में इन कंपनियों के खिलाफ रोष बढ़ता जा रहा है। व्यापारियों ने यूनाइटेड हिन्दी संवादाता मनीष शर्मा से कहा है कि ये दोनों कम्पनियां तमिलनाडु में भूजल का अंधाधुंध दोहन कर रही हैं, जिस कारण भूजल का स्तर बहुत नीचे चला गया है। व्यापारियों के इस निर्णय से केवल तमिलनाडु में ही इन कंपनियों को लगभग 1400 करोड़ रूपए का नुक्सान होने की संभावना व्यक्त की जा रही है। यदि व्यापारी और जनता एक कदम और आगे बढ़ाकर, पेप्सी-कोक के आलू चिप्स भी बेचना बंद कर दें तो यह नुक्सान और अधिक गहरा सकता है।

तमिलनाडु व्यापारी एसोसिएशन में छोटे-बड़े सभी मिलाकर 15,000 व्यापारी हैं, जबकि दुसरे व्यापारी संगठन भी इस मुहीम से जुड़ते चले जा रहे हैं। तमिलनाडु में पेप्सी का मार्केट शेयर 60% है, कोक का लगभग 30% और बाकी के शीतल पेयों का 10% दोनों ही कम्पनियों ने तमिल फिल्म इंडस्ट्री के बड़े-बड़े सितारों को विज्ञापन हेतु अनुबंधित कर रखा है। पेप्सिको कम्पनी के तमिलनाडु में सात बड़े-बड़े प्लांट हैं, जबकि कोक के पांच प्लांट हैं…. जिनमें लाखों गैलन पानी रोजाना पेप्सी निर्माण के लिए उपयोग किया जाता है, तथा लगभग इतना ही पानी बेकार भी जाता है।

ताजा कमेन्ट : Prashant Sen : मुझे तो साउथ इंडियंस ज्यादा जागरूक लगते है। नार्थ इंडियंस से ज्यादा साउथ इंडियंस अपने कल्चर को समझते है और संम्मान करते है। जल्लीकट्टू वाले प्रकरण से ये प्रमाणित होता है। बाकि भारत में भी सभी को एकजुट हो कर इन कंपनियों के खिलाफ खड़े होना चाहिए ।

सनद रहे कि इससे पहले केरल हाईकोर्ट भी इन दोनों महाकाय कंपनियों को भूजल के अत्यधिक दोहन को लेकर केरल से बाहर का रास्ता दिखा चुका है, परन्तु इन कंपनियों द्वारा उच्च स्तर पर सांठगाँठ करके उच्चाधिकारियों को रिश्वत खिलाकर बड़े पैमाने पर धांधलियाँ की जाती हैं। न तो दोहन किए जाने वाले भूजल का कोई हिसाब होता है और ना ही ये कम्पनियां बारिश में भूजल को रीचार्ज करने के कोई ठोस उपाय करती हैं। इस कारण जमीन में पानी का स्तर तेजी से घट रहा है और उधर तमिलनाडु और कर्नाटक आपस में कावेरी के पानी को लेकर भिड़े हुए रहते हैं। गरीब किसान पिसता रहता है, जबकि शहरी जनता को पीने का पानी महंगे दामों पर खरीदना पड़ता है। इन दोनों ही महाकाय कंपनियों पर जितनी जल्दी और जितनी प्रभावी लगाम कसी जाए उतना ही बेहतर होगा। तमिलनाडु के व्यापारी और जनता तो जाग रहे हैं, क्या बाकी भारत में भी ऐसा होगा ?

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