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वर्ष के कुछ ही महीनों में दिखने वाली सब्जी परवल को सभी सब्जियों में सबसे अच्छा माना गया है। आयुर्वेद में एकमात्र परवल को ही बारह महीने में सदा पथ्य के रूप में स्वीकार किया गया है क्योंकि परवल गुण में हलके, पाचक, गरम, स्वादिष्ट, हृदय के लिये हितकर, वीर्यवर्धक, जठराग्निवर्धक, स्निग्धतावर्धक, पौष्टिक, विकृत कफ को बाहर निकालने वाला और त्रिदोषनाशक है। यह सर्दी, खाँसी, बुखार, कृमि, रक्तदोष, जीर्ण ज्वर, पित्त के ज्वर और रक्ताल्पता को दूर करता है।

परवल दो प्रकार के होते हैं- मीठे और कड़वे। सब्जी के लिए सदैव मीठे, कोमल बीजवाले और सफेद गूदेवाले परवल का उपयोग किया जाता है। जो परवल ऊपर से पीले तथा कड़क हो जाते हैं उनकी अच्छी नहीं मानी जाती।

कड़वे परवल का प्रयोग केवल औषधि के रूप में होता है। कड़वे परवल हलके, रूक्ष, गरम वीर्य, रूचिकर्ता, भूखवर्धक, पाचनकर्ता, तृषाशामक, त्रिदोषनाशक, पित्तसारक, अनुलोमक, रक्तशोधक, पीड़ाशामक, घाव को मिटाने वाले, अरुचि, मंदाग्नि, यकृतविकार, उदररोग, बवासीर, कृमि, रक्तपित्त, सूजन, खाँसी, कोढ़, पित्तज्वर, जीर्णज्वर और कमजोरीनाशक है।

औषधि-प्रयोगः

कफवृद्धिः डंठल के साथ मीठे परवल के 6 ग्राम पत्ते व 3 ग्राम सोंठ के काढ़े में शहद डालकर सुबह-शाम पीने से कफ सरलता से निकल जाता है।

हृदयरोग, शरीर पुष्टिः घी अथवा तेल में बनायी गयी परवल की सब्जी का प्रतिदिन सेवन करने से हृदयरोग में लाभ होता है, वीर्यशुद्धि होती है तथा वजन बढ़ता है।

आमदोषः परवल के टुकड़ों को 16 गुने पानी में उबालें। उबालते समय उनमें सोंठ, पीपरामूल, लेंडीपीपर, काली मिर्च, जीरा व नमक डालें। चौथाई भाग शेष रह जाने पर सुबह शाम 2 बार पियें। इससे आमदोष में लाभ होता है। तथा शक्ति बढ़ती है।

रक्त विकारः इसके मरीज को प्रतिदिन धनिया, जीरा, काली मिर्च और हल्दी डालकर घी में बनायी गयी परवल की सब्जी का सेवन करना चाहिए।

विष-निष्कासनः कड़वे परवल के पत्तों अथवा परवल के टुकड़ों का काढ़ा बारंबार रोगी को पिलाने से उसके शरीर में व्याप्त जहर वमन द्वारा बाहर निकल जाता है।

पेट के रोग, दाह, ज्वरः परवल के पत्ते, नीम की छाल, गुडुच व कुटकी को समभाग में लेकर काढ़ा बनायें। यह काढ़ा पित्त-कफ प्रधान अम्लपित्त, शूल, भ्रम, अरुचि, अग्निमांद्य, दाह, ज्वर तथा वमन में लाभदायक है।

सावधानीः गर्म तासीरवालों के लिए परवल का अधिक सेवन हानिकारक है। यदि इसके सेवन से कोई तकलीफ हुई हो तो सूखी धनिया अथवा धनिया जीरे का चूर्ण घी-मिश्री में मिलाकर चाटें अथवा हरी धनिया का रस पियें।

विशेषः ज्वर, चेचक(शीतला), मलेरिया, दुष्ट व्रण, रक्तपित्त, उपदंश जैसे रोगों में मीठे परवल की अपेक्षा कड़वे परवल के पत्तों का काढ़ा अथवा उसकी जड़ का चूर्ण अधिक लाभदायक होता है।

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