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ऑनलाइन रीटेलरों की जबर्दस्त बिक्री को देखते हुए इस सवाल पर बहस होनी स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में आम रीटेलरों को अपनी दुकान समेटनी पड़ेगी ?

ऑनलाइन रीटेलरों की जबर्दस्त बिक्री को देखते हुए इस सवाल पर बहस होनी स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में आम रीटेलरों को अपनी दुकान समेटनी पड़ेगी। 

 

शादियों का मौका है और जितनी धूम बाजार में है उतनी ही फ्लिपकार्ट, एमेजॉन या स्नैपडील वेबसाइटों पर भी। दरअसल ई कॉमर्स ने भारतीय बाजार के पारंपरिक समीकरण बदल दिए हैं। मोबाइल, इलेक्ट्रानिक्स आइटम, कपड़े और तमाम दूसरी चीजें ऑनलाइन बेचने वालीं वेबसाइटों ने पिछले कुछ साल के दौरान अपना दायरा तेजी से फैलाया है। उनकी जबर्दस्त बिक्री और उनमें हो रहे भारी निवेश को देखते हुए इस सवाल पर बहस होनी स्वाभाविक है कि क्या आने वाले समय में आम रीटेलरों यानी खुदरा विक्रेताओ को अपनी दुकान समेटनी पड़ेगी ?

लेकिन पारंपरिक तरीके से कारोबार करने वाले खुदरा विक्रेताओं के लिए भी भविष्य अच्छा ही दिख रहा है। 24 बड़े रीटेलरों पर की गई क्रेडिट रेटिंग एजेंसी क्रिसिल की एक रिसर्च से निकला एक निष्कर्ष कहता है कि अगले दो-तीन साल में भी ये कंपनियां 13 से 15 फीसदी सालाना की रफ्तार से बढ़ेंगी। क्रिसिल के इस अध्ययन के मुताबिक मुश्किल हालात के बावजूद बीते पांच साल के दौरान इन रीटेलरों की बिक्री करीब 24 फीसदी सालाना के हिसाब से बढ़कर लगभग 70 हजार करोड़ रु प्रतिवर्ष के आंकड़े पर पहुंच गई है। इसी दौरान ऑनलाइन रीटेलरों के लिए यह आंकड़ा 60 फीसदी सालाना बढ़ोतरी के साथ 40 हजार करोड़ रु तक पहुंच गया।

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