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नीतीश और महागठबंधन की जीत के पीछे प्रशांत किशोर का हाथ था ! अमित शाह से मिली समर्पित कार्यकर्ताओं को उपेक्षा से नाराज होकर जा मिला था नीतीश कुमार से !!

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भारत : बिहार विधानसभा चुनावों के रुझानों में महागठबंधन बढ़त हासित कर
चुका है। अगर महागठबंधन चुनाव जीतता है, तो नीतीश कुमार का मुख्यमंत्री
बनना तय है। लेकिन महागठबंधन और नीतीश अगर जीत का स्वाद चखेंगे, तो उसके
पीछे हाथ होगा प्रशांत किशोर का। आइये आपको बताते हैं कौन हैं प्रशांत
किशोर और कैसे बनाई उन्होंने महागठबंधन के लिए रणनीति।

लोकसभा चुनाव में नरेंद्र मोदी के लिए काम करने वाली प्रशांत किशोर की
टीम ने नीतीश कुमार के लिए इन चुनावों में काम संभाला। प्रशांत की टीम
अमेरिकी राष्ट्रपति के चुनाव प्रचार की तरह जनसंवाद को लेकर नए-नए प्रयोग
करती है। नमो के लिए ‘चाय पर चर्चा’ की तर्ज पर बिहार में चुनाव के करीब
आने पर नीतीश के लिए ‘ब्रेकफास्ट विद सीएम’ कार्यक्रम शुरू किया।
PRASHANT KISHORE TEAM 4
बिहार में महागठबंधन का प्रचार अभियान काफ़ी चुस्त नज़र आया, इतना ही
नहीं ये अपने रंगों की वजह से भी ध्यान खींचता है। रंग दरअसल पार्टियों
की सोची-समझी ब्रैंडिग स्ट्रेटेजी का हिस्सा हैं, और इन रंगों के पीछे
दिमाग़ है प्रशांत किशोर का। इन चटक रंगों ने नीतीश कुमार की जनता दल
(यूनाइटेड) और लालू प्रसाद यादव की राष्ट्रीय जनता दल की ओर से पहले
इस्तेमाल किए जा रहे बोरिंग हरे और सफ़ेद रंग की जगह ली।

इस रणनीति को तैयार करते वक्त प्रशांत किशोर को ये अंदाज़ा था कि
मुक़ाबला बीजेपी के भगवा रंग से होना है। किशोर की टीम के एक सदस्य के
अनुसार केसरिया रंग काफी चमकदार है और बीजेपी का अभियान इसलिए भी काफी
चमक-दमक वाला दिखता है। ऐसे में हमें कहीं ज़्यादा चमक-दमक वाले रंग का
इस्तेमाल करना था, इसलिए हमने अभियान के दौरान लाल और पीले रंग का
इस्तेमाल किया।

दिसंबर, 2014 में प्रशांत ने मोदी का दामन छोड़कर नीतीश कुमार की मदद
शुरू की, उनके मोदी खेमा छोड़ने की वजह अमित शाह से मिली उपेक्षा बताई
जाती है। यही वजह है कि प्रशांत किशोर इस चुनाव में ख़ुद को साबित करना
चाहते थे। प्रशांत किशोर ने नीतीश को फिर से आम लोगों के नेता के तौर पर
प्रचारित किया।

बिहार में बीजेपी, महागठबंधन की तुलना में जल्दी-जल्दी अपने नारे बदल रही
थी, वहीं दूसरी ओर, प्रशांत किशोर ने पिछले कुछ महीनों में 3-4 नारों का
ही इस्तेमाल किया। नारों में केवल एक गीत का इस्तेमाल हो रहा था। बीजेपी
के संसाधनों के सामने महागठबंधन के पास संसाधनों की कमी को देखते हुए
प्रशांत किशोर ने टीवी और प्रिंट विज्ञापन पर एक पैसा नहीं खर्च करने का
फैसला लिया। उम्मीदवार अपना प्रचार खुद से कर सकते थे।

प्रशांत किशोर ने इसकी जगह उन पैसों का इस्तेमाल बीजेपी का जवाब देने के
लिए रेडियो विज्ञापन दिए और स्वयंसेवियों को तैयार किया। स्वयंसेवियों के
लिए तीन रणनीतियां बनाई गईं, इनमें नीतीश कुमार का पत्र लेकर
स्वयंसेवियों को दरवाजे- दरवाजे तक भेजा गया। इसमें एक नंबर पर मिस्ड
कॉल्स करने की अपील की गई थी। इसके जवाब में उन्हें नीतीश कुमार का
रिकॉर्डेड कॉल किया जाता था।

प्रशांत किशोर ने ये भी सुनिश्चित किया कि नीतीश कुमार और लालू प्रसाद
यादव एक साथ बहुत ज़्यादा रैलियों में नहीं जाएं, क्योंकि दोनों नेताओं
की स्टाइल अलग थी, उनके श्रोता अलग-अलग हैं और जातिगत पकड़ भी अलग-अलग
है। ऐसे में, प्रशांत किशोर ने तय किया कि वे दोनों अलग-अलग सभी 243
क्षेत्रों में एक बार जरूर जाएं।

नीतीश जहां अपने भाषणों में विकास की बात करते दिखते थे, वहीं लालू
सामाजिक न्याय और जातिगत ध्रुवीकरण पर जोर दे रहे थे, इसके पीछे विचार
यही था कि दोनों नेता एक दूसरे के पूरक नजर आएं। इस रणनीति ने काम किया
और परिणाम सबसे सामने हैं।

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