जवान वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण "युद्ध" है या गले की फाँस बन गया "पाकिस्तान" ?

तब छोटे कद वाले भारतीय प्रधानमन्त्री शास्त्री जी ने हस्तक्षेप किया और मेजर जनरल हरबख्श सिंह को पाकिस्तानी पंजाब पर पूरी ताकत से हमले का जवाब देने को कहा..!! फिर क्या था, भारतीय सेना पाकिस्तान के घर में घुस गयी लाहौर तक और वहाँ तिरंगा फहरा दिया..!!

ऐसी अफ़रातफ़री मची कि अमेरिका तक को भारत से अनुनय-विनय करना पड़ा कि भैया, कुछ देर का विराम दो ताकि हम लाहौर से अपने अमेरिकी नागरिकों को लेकर वहाँ से भागे..!! भारतीय सेना के कब्ज़े में 19 सौ वर्ग किलोमीटर से ज्यादा का पाकिस्तानी भूभाग कब्ज़े में आ गया था..अब भारत पर चौतरफ़ा दबाव पड़ने लगा..!!

अमेरिकी राष्ट्रपति लिंडन जॉनसन ने शास्त्री जी को युद्ध के बीच में ही धमकी दी कि पीएलए 480 के तहत भारत को जाने वाले गेहूँ की आपूर्ति रोक दी जायेगी..!!

शास्त्री जी स्वाभिमानी व्यक्ति..उन्होंने अपनी धर्मपत्नी ललिता जी से कहा कि आज शाम में खाना मत बनाइएगा क्योंकि अगर हमारे बच्चे आज भूख बर्दाश्त कर लेंगे, तभी मैं कल देशवासियों से राष्ट्रहित में एक समय खाना न खाने की अपील करूँगा ताकि इस विषम परिस्थिति में अमेरिका की भभकी का हम सामना कर सकें..!!

राष्ट्र अपने प्रधानमन्त्री के साथ खड़ा हो गया..

इस दौरान अमेरिका ने भारतीय युद्धक विमानों का बहुत मजाक बनाया था..पर भारत के कम आधुनिक युद्धक विमान, पाकिस्तान के अमेरिका-निर्मित कथित आधुनिक विमानों के लिए ‘मौत के सौदागर’ साबित हुए..अमेरिकी पैटन टैंकों की तो भारतीय सेना ने वाट लगा दी..!

युद्ध समाप्त करने का चौतरफ़ा दबाव पड़ने लगा.. तब शास्त्री जी ने अपने सेनाध्यक्ष ‘महान’ चौधरी साहेब से पूछा कि क्या स्थिति है..चौधरी साहेब ने कहा कि अब हमारे गोला-बारूद खत्म होने की स्थिति में हैं..!! तब शास्त्री जी दबाव में आ गए..जबकि सच्चाई यह थी कि तब भारत का मात्र 14% गोला-बारूद ही खत्म हुआ था, जबकि पाकिस्तान की जीभ बाहर और हाथ-पैर चारों कोनों में छितराने को थे..!

ख़ैर..शास्त्री जी ने हमेशा की भारतीय रणनीति कि शत्रु को माफ़ कर देना चाहिए, भारत सदा से एक सहिष्णु राष्ट्र रहा है, भारत का दिल काफ़ी बड़ा है, भारत ये है, भारत वो है, भारत महान है, अगर कोई एक गाल पे थप्पड़ मारे तो दूसरा भी बढ़ा देना चाहिए..आदि-आदि के तहत ताशकन्द समझौता कर लिया और इस दबाव में तथा भारतीय सैनिकों को दिए वचन कि वह कब्जाए गए भूभाग को नहीं छोड़ेंगे, के चलते हृदयाघात के शिकार हुए और वहीं उनकी रहस्यमय मृत्यु हो गयी..!!

वैसे..इस युद्ध के पहले अयूब खान ने कहा था कि वे टहलते हुए दिल्ली पहुँच जायेंगे..तब बाद में दिल्ली के रामलीला मैदान में अपार जनसमूह को संबोधित करते शास्त्री जी ने कहा था कि भाई, अयूब खान साहेब बड़े आदमी हैं, लहीम-शहीम हैं..उन्हें क्यों कष्ट दें दिल्ली आने का..हम ही लाहौर पहुँच जाते हैं..!!

अब आप लोग खुद ही अंदाज़ा लगा लीजिये कि हमारे जवान जो वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण “युद्ध” है या फिर हमारे गले की फाँस बन गया “पाकिस्तान” नामक जहरीला सर्प..जिसे हमारे हुक्मरानों ने बार-बार हमेशा मासूम समझ छोड़ दिया..!! कतिपय वामपंथियों को इसका कारण “युद्ध” लगता है..क्योंकि उन्हें अत्यंत सीधे वामपंथी चीन व उसके साथी मासूम पाकिस्तान बड़े प्यारे हैं..!!