जवान वीरगति को प्राप्त होते हैं, उसका कारण "युद्ध" है या गले की फाँस बन गया "पाकिस्तान" ?

ब्लॉग: ( कुमार प्रियांक ) :- 1965 का वर्ष एक ऐसा वर्ष था जब भारत के तमाम विरोधियों को ऐसा लग रहा था कि भारत एक अत्यंत कमजोर देश है। कारण थे:- 1962 में वामपंथी चीन पर भरोसा कर नेहरू जी ने जरूरत से ज्यादा अच्छा दिखने के चक्कर में भद्द पिटा ली थी.., दूसरे अकाल का दौर था, तीसरे नेहरू जी की मृत्यु के बाद प्रधानमन्त्री बने थे छोटे कद के और पतली आवाज़ वाले चकाचौंध से दूर रहने वाले लाल बहादुर शास्त्री जी..!!

शास्त्री जी की पार्टी काँग्रेस भी यही मान कर चल रही थी कि शास्त्री जी सिर्फ एक अल्पकालिक व्यवस्था के तहत प्रधानमन्त्री हैं और देर-सबेर चापलूस संस्कृति के तहत नेहरू-गाँधी परिवार के वारिस को सत्ता मिलनी ही है..!!

पर जिस नियति ने शास्त्री जी के माथे पर ताज सजाया था, उसके मन में कुछ और ही था। पाकिस्तान के तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल अयूब खान को नई दिल्ली आना था, पर नेहरू जी की मृत्यु के चलते उन्होंने दिल्ली आने का कार्यक्रम रद्द कर दिया क्योंकि उन्हें लगा कि शास्त्री जी का कद इतना नहीं कि वह जाकर मिले..!!

तब सौम्य शास्त्री जी आगे अपनी काहिरा की शासकीय यात्रा से वापस लौटते हुए अचानक से कराँची में उतर गए और अयूब खान को दंग कर दिया..अयूब खान खुद एअरपोर्ट आये शास्त्री जी को छोड़ने। अयूब खान समझ गए थे कि ये छोटे कद का आदमी बात नहीं मानता..!!

इधर 1965 की गर्मियों में तत्कालीन पाकिस्तानी विदेश मंत्री ज़ुल्फ़िकार अली भुट्टो को लगा कि कश्मीर को जीतने का इससे अच्छा मौका फिर न मिलेगा। भुट्टो ने पाकिस्तानी सेनाध्यक्ष मोहम्मद मूसा को टॉप सीक्रेट सन्देश भेजा कि कश्मीर को हासिल करने का यह बहुत बढ़िया वक़्त है। अगर उपयुक्त समय और स्थान पर हमला किया जाये तो सामान्य धारणा के अंतर्गत, दो तगड़े झटके इन हिंदुओं का मनोबल तोड़ने को पर्याप्त होंगे..!!

पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत लगभग 33 हजार सैनिकों की फ़ौज़ को कश्मीरी कपड़े पहना कर अगस्त 1965 के पहले हफ्ते में कश्मीर में घुसपैठ करा दिया..पाकिस्तानी हुक्मरान को यह फुलटूस भ्रम था कि कश्मीरी उन्हें हाथों-हाथ लेंगे..!!

पर यह क्या.. उल्टे 15 अगस्त 1965 को कश्मीरियों के माध्यम से ही भारतीय सेना को इस घुसपैठ की जानकारी मिली। तब तक पाकिस्तानी फ़ौज़ उरी, पूँछ आदि सेक्टर में घुस चुकी थी..!! भारतीय सेना ने जवाबी कार्रवाई शुरू की..और ग़ुलाम कश्मीर के हाजी पीर दर्रे पर कब्ज़ा कर लिया..!!