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स्त्रोत – जागरण 07 मई 2016, हिमचाल संस्करण

(लेखक देविंदर शर्मा कृषि और खाद्य नीति मामलों के जानकार हैं)

कृषि अर्थशास्त्री हमेशा कृषि आय में बढ़ोतरी के लिए फसल उत्पादन में वृद्धि के पक्ष में रहे हैं। मैं कई अर्थशास्त्रियों को जानता हूं जो कृषि संकट के लिए कम उत्पादकता को दोष देते हैं। हम प्राय: कहते रहे हैं कि ग्लोबलाइजेशन के दौर में किसान तभी बचे रह सकते हैं जब वे विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धी होंगे। अमेरिका या चीन जैसे देशों में जो किसान फसल की ऊंची पैदावार के स्तर को नहीं छू पाते उन्हें आत्महत्या करने के अलावा दूसरा कोई चारा नहीं होता।

चार दशक हो गए अर्थशास्त्रियों की एक ही तरह की बातों को सुनते हुए कि किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए तकनीक का प्रयोग करें, उत्पादन लागत घटाएं, फसल विविधिकरण को अपनाएं, सिंचाई क्षमता को बढ़ाएं और बिचौलियों के चंगुल से बचने के लिए इलेक्ट्रॉनिक ट्रेडिंग के प्लेटफॉर्म पर जाएं। इन सभी सुझावों को लोग सालों से सुनते आ रहे हैं। उनकी मूलत: यही धारणा है कि कृषि संकट मुख्य रूप से किसानों की देन है, क्योंकि उन्होंने आधुनिक तकनीक और फसल की नई किस्मों का उपयोग नहीं किया है। वे बैंक कर्ज का उपयोग करना नहीं जानते हैं। वे लागत को कम नहीं कर पा रहे हैं और परिणामस्वरूप उनका बकाया कर्ज बढ़ता जा रहा है।

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