ब्लॉग : पीएम नरेंद्र मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी शक्ति

मोदी के अंधविरोधी हैं उनकी सबसे बड़ी ताकत

ब्लॉग : Neeraj Badhwar (facebook Coyp) :- बीजेपी को यूपी में 325 सीटें मिलने के बाद से बहुत से लोग इसे लेकर काफी हैरान हैं। ये वो लोग हैं जो ‘स्थानीय लोगों’ से की गई बातचीत और ‘ज़मीनी हालात’ के आधार पर बीजेपी की हार का दावा और दुआ कर रहे थे। और जब योगी आदित्यनाथ वहां मुख्यमंत्री बन गए, तो ये समझ नहीं पा रहे कि ऐसा कैसे हो गया?

इसी तरह की हैरानी इन्हें तब भी हुई थी जब 3 साल पहले नरेंद्र मोदी अपने दम पर प्रधानमंत्री बन गए थे। यूं तो मैं ज़्यादा लंबा लिखने से बचता हूं मगर अब इस वर्ग की हैरानी इतनी दयनीय लगने लगी है कि सोचा अपने भी कुछ विचार साझा कर लूं।

पहली बात उन पत्रकारों की हैरानी के बारे में जो दावे तो कुछ और कर रहे थे और हुआ कुछ और। उनसे मुझे ये कहना है कि भाई आप किसी भी मुद्दे पर तय निष्कर्ष के साथ अपनी ही सोच वाले मेहमान बुलाकर अगर ‘निष्पक्ष’ चर्चा करोगे तो उस चर्चा से वही निकलकर आएगा जो आप चाहोगे।

अगर आप खुद से अलग सोच रखने वाले व्यक्ति को सोशल मीडिया के हर प्लेटफॉर्म पर ब्लॉक करते रहोगे, तो आप उन ही लोगों से घिर जाओगे जो आप जैसा सोचते होंगे या आपकी ही सोच का गुणगान करते होंगे। अब ऐसे लोगों की संगत से आप किसी ‘ज़मीनी हकीकत’ का अंदाज़ा लगाएंगे, तो आप खुद को अंधेरे में रखेंगे और ये अंधेरा आपकी टीवी स्क्रीन से भी ज़्यादा गहरा और काला होगा ।

अब बात करते हैं बीजेपी की जीत की। मुझे ईमानदारी से लगता है कि 2014 में जब प्रधानमंत्री पद के लिए मोदी की उम्मीदवारी सामने आई थी, तो बहुत से लोग उनमें एक ईमानदार प्रशासक तो देखते थे मगर इस बात का भरोसा बहुत कम लोगों को था कि वो बीजेपी को बहुमत दिला सकते हैं। मगर इसके बाद साम्प्रदायिकता के नाम पर उन्हें विपक्षी दलों, मीडिया और ख़ास वर्ग की तरफ से इतनी गालियां दी गईं कि इन गालियों ने उनके लिए वो काम कर दिया जो खुद मुख्यमंत्री रहते उनका काम भी नहीं कर पाता!

मगर अंध विरोधियों के ये बात न तब समझ आई थी न अब आई है। उन्हें ये मामूली बात समझ नहीं आई कि मोदी को मोटे तौर पर लोगों ने विकास के एजेंडे पर ही चुना था और अगर उन्हें मोदी को किसी मुद्दे पर घेरना है तो वो भ्रष्टाचार और विकास से ही जुड़ा हो सकता है।

मगर ये तो तर्क की बात हो गई। और जब हम किसी से नफरत करते हैं, तो तर्क तो इस्तेमाल की जाने वाली आखिरी चीज़ होती है। आप बीवी को साथ न रखने के लिए उनका मज़ाक बनाओगे, विदेश यात्राओं के लिए खिल्ली उड़ाओगे, कपड़ों के लिए तंज कसोगे। इस तरह से जितने non issue थे हर किसी को issue बनाने की कोशिश की गई। दादरी जैसे अपवाद को देश का करंट स्टेटस बताकर उसे बढ़ती असहिष्णुता से जोड़ा गया। अवॉर्ड लौटाए गए, कन्हैया कुमार पैदा किए गए, स्क्रीनें काली की गईं। खुद ही एक दूसरे की पीठी खुजा और थपथपाकर ये तसल्ली भी कर ली गई कि हम सही रास्ते पर जा रहे हैं मगर हुआ क्या?

मैं हमेशा ये कहता हूं कि जनता बड़ी संयमी होती है। वो सरकारों के विश्लेषण करने में वैसी बेसब्र और पूर्वाग्रही नहीं होती जैसा एक ख़ास वर्ग होता है। जब तक उसे लगता है कि सरकार की नीयत साफ है, वो ईमानदारी से काम कर रही है, जो कर सकती थी कर रही है,तब तक लोगों का उस पर भरोसा डगमगाता नहीं।

उससे भी बड़ी बात पत्रकारों या धार्मिक कट्टरपंथियों के उलट आम आदमी को किसी नेता को खारिज ही नही करना होता, उसे चयन भी करना होता है। आप कहते हैं मोदी बुरा है… मोदी बुरा है…तो…अच्छा कौन है…राहुल गांधी!

बड़ा ताज्जुब होता है कि जिस राहुल गांधी ने सक्रिय राजनीति में आने के बाद कांग्रेस को दो दर्जन से ज़्यादा चुनाव हरवा दिए, उसकी ये वर्ग चर्चा नहीं कर रहा। पंजाब में केजरीवाल के हारने पर उसे दिल्ली में उनके काम पर मिले जनादेश के तौर पर नहीं देख रहा मगर ये सवाल ज़रूर पूछ रहा है कि योगी आदित्यनाथ को सीएम क्यों बना दिया? लोगों ने तो विकास के लिए बीजेपी को वोट दिया था।

भाई इतनी तो राजनीतिक समझ पैदा करो जब जनता किसी पार्टी को तीन चौथाई से भी ज़्यादा समर्थन देती है, वो भी यूपी जैसे राज्य में, तो वो समर्थन नहीं देती बल्कि अपने भरोसे का समर्पण करती है। वो कहती है कि भरोसा किया है चाहो जो कर लो। मगर अब भी बजाए इस जनसमर्थन को समझने के इस नुख्ताचीनी में लगे हैं कि घर का शुद्धीकरण क्यों करा दिया, सांसद को मुख्यमंत्री क्यों बना दिया।

मार्क ट्वेन ने कहा था गुस्सा उस तेजाब की तरह होता है जो जिस प्याले में होता है उसे ही सबसे ज़्यादा नुकसान पहुंचाता है। किसी के प्रति नफरत भी वैसे ही होती है। तभी तो देखिए न जो मोदी 2014 में प्रधानमंत्री बनते नहीं दिख रहे थे उन्हें प्रधानमंत्री बनवा दिया और जो बीजेपी पिछली बार 50 सीटें नहीं ला पाई थी वो सवा तौन के पार चली गई। और ये सब हुआ है तो इसमें मोदी का कम और उनके इन अंधविरोधियों का प्रताप ज़्यादा है!