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माउन्ट ज़िओन यूनि. ऑफ केलिफोर्निया में हुए शोध के अनुसार मांसाहार में जो एसिड होता है, उसे पचाने के लिए बेज़ की ज़रूरत होती है। लीवर के पास पर्याप्त बेज़ न हो तो वह बेज़ हड्डियों से लेता है, क्योंकि हड्डियाँ बेज़ और कैल्शियम से बनी होती हैं। इसका मतलब लीवर मांस पचाने के लिए पर्याप्त बेज़ पैदा नहीं कर सकता है तो हड्डियों में से वह मिलने लगता है और अंत में हड्डियाँ पिसती जाती हैं. छोटी भी बनती जाती हैं और कमजोर भी होती जाती हैं। इसलिए हड्डियों का फ्रैकचर भी अधिक मांस खाने वालों को होता है। इसलिए इस शोध में शाकाहार को ही ज़्यादा महत्त्व दिया गया है।

मांसाहार पर किये गये परीक्षणों के आधार पर तो यहाँ तक कहा है कि मांसाहार करना मतलब भयंकर बीमारियों को आमंत्रण देना है. मांसाहार से कैंसर, हृदय रोग, चर्मरोग,कुष्टरोग, पथरी और किडनी संबंधी ऐसी अनेक बीमारियाँ बिना बुलाये आ जाती हैं।

डॉ. बेंज ने अपने अनेक प्रयोगों के आधार पर तो यहाँ तक कहा हैः “ मनुष्य में क्रोध, उद्दंडता, आवेग, अविवेक, अमानुषता, अपराधिक प्रवृत्ति तथा कामुकता जैसे दुष्ट कर्मों को भड़काने में मांसाहार का अत्यंत महत्त्वपूर्ण हाथ होता है क्योंकि मांस लेने के लिए जब पशुओं की हत्या की जाती है उस समय उनमें आये हुए भय, क्रोध, चिंता, खिन्नता आदि का प्रभाव मांसाहार करने वाले व्यक्तियों पर अवश्य पड़ता है। “

अमेरिका की स्टेट यूनि. ऑफ न्यूयार्क, बफैलो में किये हुए अनेक शोध के परिणामस्वरूप वहाँ के विशेषज्ञों ने कहा हैः “ अमेरिका में हर साल 47000 से भी ज़्यादा ऐसे बालक जन्म लेते हैं, जिनके माता-पिता के मांसाहारी होने के कारण बालकों को जन्मजात अनेक घातक बीमारियाँ लगी हुई होती हैं। “

मांसाहार से होने वाले घातक परिणामों के विषय में प्रत्येक धर्मग्रंथ में बताया गया है। मांसाहार का विरोध आर्यद्रष्टा ऋषियों ने, संतों-कथाकारों ने सत्संग में भी किया है, यही विरोध अभी विज्ञान के क्षेत्र में भी हुआ है। फिर भी, अगर आपको मांसाहार करना हो, अपनी आने वाली पीढ़ी को कैन्सरग्रस्त करना हो, अपने को बीमारियों का शिकार बनाना हो तो आपकी इच्छा। अगर आपको अशांत, खिन्न, तामसी होकर जल्दी मरना हो तो करो मांसाहार! नहीं तो आज ही हिम्मत करके संकल्प करो और मांसाहार छोड़ दो।

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