loading...

कांग्रेस ने खड़ा किया 'भगवा आतंकवाद' का मुद्दा? हेमंत करकरे के इस फैसले से फंसी साध्‍वी प्रज्ञा?

loading...

कोई भी स्त्री या पुरुष किसी मुक़दमे में या तो कसूरवार होता है या बेकसूर। कोई कसूरवार और बेकसूर दोनों हो सकता है क्या? एक जाहिल आदमी भी कहेगा-नहीं! लेकिन मालेगांव ब्लास्ट 2008 की मुख्य आरोपी साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर दोषी भी हैं और बेकसूर भी। जब दिल्ली और महाराष्ट्र में कांग्रेस सरकार थी तब वह दोषी थीं। अब दोनों जगह बीजेपी की सरकार है, तब वह बेकसूर हैं। मतलब यहां दोषी होने या न होने का फ़ैसला कोर्ट नहीं, राजनीतिक दल कर रहे हैं।

संभवतः इस तरह की विचित्र मिसाल भारत जैसे देश में ही देखने को मिल सकती है, जहां कोई किसी केस में दोषी है या नहीं, यह इस बात पर निर्भर करता है कि उसकी वफादारी किस राजनीतिक दल के प्रति है। यानी यहां अदालत का रोल ही ख़त्म कर दिया गया।

जैसा कि सब जानते हैं, न्यायिक हिरासत में क़रीब आठ साल से जेल में बंद साध्वी प्रज्ञा को नैशनल इनवेस्टिगेशन एजेंसी यानी एनआईए के 13 मई 2016 को दायर पूरक आरोप-पत्र में क्लीनचिट दी जा चुकी है। उम्मीद की जा रही है कि क़ानून की औपचारिक प्रक्रिया पूरी होते ही वह कम से कम इस केस से बरी कर दी जाएंगी और संभव है कि वह जेल से रिहा भी हो जाएं।

साध्वी को बरी करने का मतलब ब्लास्ट में उनके ख़िलाफ़ जांच एजेंसियों के पास इतने सबूत नहीं हैं, जिससे उन्हें दोषी साबित कर सज़ा दिलाई जा सके। इसका यह भी मतलब होता है कि साध्वी और अन्य दूसरे पांच आरोपियों को बिना पर्याप्त सबूत के ही गिरफ़्तार कर लिया गया था। यानी उस अपराध ने उनकी ज़िंदगी ही नष्ट नहीं कर दी, बल्कि उन्हें आठ साल की सज़ा भी दे दी, जिस अपराध को उन्होंने किया ही नहीं था। ऐसे में सवाल यह उठता है कि क्‍या यह सब अमानवीय काम मुंबई आतंकी हमले में शहादत देने वाले महाराष्ट्र एटीएस के पूर्व मुखिया हेमंत करकरे के इशारे पर हुआ था?

1 of 6
CLICK ON NEXT BUTTON FOR NEXT SLIDE

loading...