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विचारक गोविंदाचार्य

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ प्रचारक केएन गोविंदाचार्य 1988 में भाजपा से जुड़े. साल 2000 तक वो पार्टी के महासचिव थे. उन्हें तत्कालीन प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी से कथित मतभेदों के चलते पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा था. उसके बाद से मुख्य धारा की राजनीति से दूर रहने वाले गोविंदाचार्य भाजपा और कांग्रेस दोनों की समान रूप से आलोचना करते रहे हैं.

कैच न्यूज़ ने बिहार चुनाव से ठीक पहले उनसे ख़ास बातचीत की थी. उस दौरान उनकी कही बातें आज भी उतनी ही प्रासंगिक है. बातचीत के चुनिंदा अंशः govindacharya1

मोदी सरकार ने अच्छे दिन का नारा दिया गया था. अब सब उसका मूल्यांकन कर रहे हैं. कांग्रेस को इसमें नाकामी दिखती है. बीजेपी और आरएसएस मूल्यांकन करते हैं तो उन्हें सब अच्छा दिखता है, सिर्फ गिने-चुने सुर हैं जो अलग सुनाई देते हैं. आप इसे किस तरह देखते हैं?

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आज़ादी के बाद पहली बार गैर-कांग्रेसी सोच का एक नेता और राजनीतिक दल पूर्ण बहुमत लेकर सत्ता में आ सका है. उसके सत्ता में आने का कारण है, तीन प्रकार के समर्थकों की ताकत को इकट्ठा कर देना. बीजेपी को मिले करीब 31 फीसदी वोट में से 10 फीसदी ऐसे लोग हैं जो संघ परिवार के इतने वर्षों के काम, जनसंघ की पृष्ठभूमि के कारण जुड़े हैं. 10 प्रतिशत ऐसे हैं जो यूपीए-2 के कामकाज से सख्त नाराज़ थे. उन्हें लगा मोदी ने नई उम्मीद जगाई है. बीजेपी के प्रति वो इतने अनुकूल नहीं थे. लेकिन उन्हें लगता था कि सरकार बदलने से कुछ हो पाएगा. अच्छे दिन के नारे ने सबसे ज़्यादा इस वोटर को अपील किया. तीसरा वर्ग है नई पीढ़ी. इनको भी इस नारे ने लुभाया. उन्हें रोज़गार दिखाई दिया. वो विदेशी बैंकों से अवैध धन की वापसी के वायदे से भी आकृष्ट हुए. इन तीनों वर्गों को एक साथ लाने की कुशलता के कारण ये सरकार बनी. इसको बीजेपी की सरकार कम कहा जाएगा, ये नरेंद्र मोदी की सरकार ज़्यादा है.

आप कह रहे हैं कि ये मोदी की सरकार ज़्यादा है. ऐसे में ये प्रश्न उठता है कि क्या बीजेपी में संगठन गौण हो गया है?

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ऐसी स्थिति में आप दो बातें पाएंगे. एक है सत्ता का अति-केंद्रीकरण और उसमें अफसरों पर निर्भरता ज्यादा होना. दूसरा, सरकार में पार्टी का वजूद नगण्य हो जाना. सत्ता तो आती-जाती रहती है. पार्टी के उपकरणों का कमज़ोर होना ज़्यादा चिंताजनक है. ख़ासकर ऐसी की पार्टी के लिए, जिसके लिए सत्ता अभीष्ट नहीं है. पार्टी में पदाधिकारी कौन हैं, किसी को नहीं मालूम. केवल अध्यक्ष को लोग जानते हैं. आप देखेंगे कि पार्टी के मोर्चों की गतिविधियों में कहीं कोई दम नहीं दिखता. इसी तरह आप ई-मेंबरशिप को देख लीजिए. पार्टी के संविधान में इसका प्रावधान नहीं है. इसे वैधानिक बनाने के लिए राष्ट्रीय परिषद की पुष्टि होनी थी. कार्यसमिति, राष्ट्रीय परिषद्,पदाधिकारी इन सब की कोई भूमिका बची ही नहीं है.

इस लिहाज से तो 2014 के चुनाव आते-आते पार्टी में संगठन गौण हो चुका था. जिन्हें हम अध्यक्ष कहते हैं उन्हें शायद मोदी की वजह से जाना जाता है.

उनका कोई अलग वजूद नहीं है. ये भी एक कारण रहा है पार्टी के हाशिये पर चले जाने का. इस कार्यपद्धति की विवेचना ना होने से ये स्थिति आई है.

अमेरिका, ब्राज़ील जैसे देशों में गाय के साथ दूध देने वाली मशीन की तरह व्यवहार होता है

जहां तक सरकार की उपलब्धियों का सवाल है, हमें कहना होगा कि नीयत ठीक है,ठोस परिणामों के लिए अभी और प्रतीक्षा की ज़रुरत है. दो-तिहाई लोग अब भी मोदी की ओर देख रहे हैं. उन्हें लगता है प्रधानमंत्री कुछ करेंगे. लेकिन एक तिहाई परंपरागत वोटर ज़रूर हताश है. उदाहरण के लिए, राम-जन्मभूमि का मुद्दा है. जितना ज़मीन अधिग्रहण के लिए कानून बनाने का प्रयास दिखता है उतना राम-जन्मभूमि को लेकर नज़र नहीं आता. बीजेपी ने पीडीपी के साथ सरकार बना लिया लेकिन धारा 370 के बारे में कोई नहीं सोचता. गौ-हत्या पर पाबंदी की बात पीछे छूट जाती है. अगर गौ-वध नहीं रुक सकता तो भी गौ-मांस का निर्यात तो रुक सकता है. लेकिन ऐसा नहीं होता. उल्टा, निर्यात 22 हज़ार करोड़ रुपये से बढ़कर 26 हज़ार करोड़ तक पहुंच जाता है. प्रधानमंत्री का आग्रह गौ-संवर्धन पर तो होता है. गौ-हत्या पर पूर्ण पाबंदी के बाद बैल कटने नहीं जाएंगे तो उनका क्या होगा? उनकी व्यवस्था क्या होगी? इस पर कोई साफ रुख़ नहीं दिखता.

अमेरिका, ब्राज़ील जैसे देशों में गाय के साथ दूध देने वाली मशीन की तरह व्यवहार होता है. वहां डेयरी और बूचड़खाने का मेल है. सूखी गाय और नरवंश को बूचड़खाने के लिए रखा जाता है. वहां बूचड़खाने की व्यवस्था पर भी उतना ही ध्यान दिया जाता है. लेकिन ये भारत की परंपरा के विरुद्ध है. गाय के प्रति ये दृष्टिकोण भारतीय मानस स्वीकार नहीं करता है.

आपके मुताबिक बीजेपी अपने मूल मुद्दों से हट गई है। तो क्या नए नारे इसलिए खोजे जा रहे हैं क्योंकि पुराने मुद्दों की ओर तवज्जो नहीं दी जा रही है? govindacharya-writes-letter-to-obama-for-comments-on-religious-intolerance-54d495a31cf7f_l

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भुलावा देने और भटकाने की नीति ज़्यादा दिन काम नहीं आती है क्योंकि लोग समझने लगते हैं. मसलन, गंगाजी की बात है। सभी मानते हैं कि गंगा को निर्मल और अविरल करना है. सरकार ने भी यही भावना जताई है. लेकिन तार्किक तौर पर देखें तो निर्मलता तब रहेगी जब अविरलता रहेगी. अविरलता तब होगी जब गंगा में पानी होगा. पानी तब होगा जब सरकार गंगा में पारिस्थितिक बहाव (इकोलॉजिकल फ्लो) को सुनिश्चित करेगी. इस मामले में सरकार का रुख़ साफ नहीं है। सिर्फ सतही तौर पर काम करना गंगा के प्रति अन्याय होगा. इसे लोग सहन नहीं करेंगे. इसलिए सब लोग मान रहे हैं कि सरकार की नीयत कुछ करने की है. लेकिन दिशा और प्राथमिकताएं स्पष्ट नहीं हैं.

सरकार की छवि ऐसी बन रही है कि वो गरीब-विरोधी है, जन-विरोधी है, संवाद करना नहीं जानती और किसान विरोधी है. इस वजह से वो अमीर-परस्त और अमेरिका-परस्त नज़र आती है. उनका आग्रह है स्मार्ट सिटी, बुलेट ट्रेन और ज़मीन अधिग्रहण. उनके दिमाग मेें भारत के विकास का नक्शा अमेरिका, अर्जेंटीना या ब्राज़ील सरीखा दिखता है. 30-40 हजार हेक्टेयर के डेयरी फार्म हों, उनमें बूचड़खाने हों. विश्व बैंक का कहना है कि 2020 तक भारत में 40 करोड़ किसानों को खेती से बाहर लाया जाए. ये सरकार भी उसी दिशा में सोचती नज़र आती है. इसी काम को करने के लिए वो ‘मेक इन इंडिया’ का प्रचार कर रहे हैं. ‘मेक इन इंडिया’ जब तक ‘मेड बाय इंडिया’ और ‘मेड फॉर इंडिया’ नहीं होता तब तक कोई फायदा नहीं होगा. मेक इन इंडिया का मतलब है विदेशियों को खुली लूट का आह्ववान. ये देश के लिए आत्मघाती होगा. इससे औद्योगिक शक्ति नहीं बढ़ेगी. हमारे बिहार में कहा जाता कि भाई के भरोसे शादी नहीं की जाती है. हमें अपनी उत्पादन क्षमता बढ़ाने की ज़रूरत है.

अब विदेश नीति की बात आती है. इस मामले में स्वतंत्रता के बाद नरेंद्र मोदी सबसे सक्रिय प्रधानमंत्री कहलाएंगे. लेकिन महज़ दूसरे देशों में जाकर दौरा करने,भाषण देने और लोगों के साथ सेल्फी खिंचाने से बात नहीं बनती है. सरकार ने शुरुआत नवाज़ शरीफ से की थी. आज भारत-पाक संबंधों की स्थिति क्या बनी है?

भारत को चाहिए कि अपने हितों को ध्यान में रखकर विदेश नीति बनाए. इसमें पूरब के देशों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए

15 अगस्त तक तो खतरा है कि पाकिस्तान में हुर्रियत और पाकिस्तान के झंडे फहराये जाएं. आज़ादी की मांग चरम पर पहुंच जाए और तिरंगे जलाते हुए लोग दिखें.

कूटनीति में हर बात कही नहीं जाती. म्यामांर में जो हुआ उसके बाद कूटनीतिक दृष्टि से भारत की इज़्ज़त तो म्यामांर ही बचा रहा है. वरना भारत की छवि तो सरहद पार जाकर हमला करने की ही बन रही है. इससे बाद में अंतर्राष्ट्रीय जगत में कठिनाई आएगी. आपकी छवि अगर दादागीरी करने वाले राष्ट्र की बनती है तो भारत के अलग-थलग होने का खतरा है. इसलिए विदेश नीति में नफ़ासत की बहुत ज़रूरत है.

चीन के साथ भी गलबहियां तो बहुत अच्छी थीं लेकिन नतीजा क्या निकला..अमेरिका, जापान, भारत और ऑस्ट्रेलिया धुरी बना रहे हैं. ये कोशिश अमेरिका की सरपरस्ती में हो रही है. लेकिन चीन, इस्लामिक देश, अफ्रीका और यूरोप के कुछ देश इसके खिलाफ लामबंद हो सकते हैं. भारत को चाहिए कि अपने हितों को ध्यान में रखकर विदेश नीति बनाए. इसमें पूरब के देशों को नज़रअंदाज़ नहीं करना चाहिए.

उदारीकरण के दौर के बाद से संघ परिवार ने अमेरिका को ‘दानव’ की तरह पेश किया है. चाहे वो डंकल समझौते का मामला हो, विदेशी उत्पाद हों या आयातित बीज…इस नज़रिए से क्या सरकारी नीतियों का वर्तमान मॉडल संघ का है, वीएचपी का है, बीजेपी का अपना है, दीन दयाल उपाध्याय का है? आखिर किसका है?

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देश में विकास की दो विचारधाराएं हैं. एक सोच ये है कि राजसत्ता और अर्थव्यवस्था का विकेंद्रीकरण हो. जो जहां है उसे विस्थापित ना होना पड़े. उसे इज़्ज़त की रोटी मिल सके. ये स्वदेशी मॉडल है। 40 करोड़ किसानों को भगाना और उसके मुताबिक मुआवज़ा देना- ये अमेरिका और ब्राज़ील का मॉडल है. 30 हजार हेक्टेयर के फार्म, डेयरी और बूचड़खाने- ये विदेशी प्लान है. हर किसान के खूंटे पर मवेशी, कृषि और पशुपालन को मिलाकर बनी अर्थव्यवस्था, भारत के विकेंद्रित विकास का स्वरूप है.

सरकार का काम साधनहीनों के पक्ष में हस्तक्षेप करने का है. लेकिन सरकार इस दायित्व से पीछे हटती नज़र आ रही है

सरकार दो मूलभूत तथ्यों को भूल रही है. वो ये मानते हैं कि छोटी जोत उत्पादक नहीं है. इसे वैज्ञानिक स्तर पर गलत साबित किया जा सकता है. दूसरा- कृषि की स्वावलंबता और खाद्य सुरक्षा खत्म होने का बहुत बड़ा नुकसान होगा. फूड सेक्योरिटी की कीमत पर कृषि नीति बनाना या ज़मीन अधिग्रहण करना देश की सार्वभौमिकता पर संकट खड़ा करेगा. प्राथमिकता होनी चाहिए शुद्ध पेयजल की, प्राथमिकता होनी चाहिए परिवार को सक्षम बनाने की. आज के नीति नियामक किसानों के खेती छोड़ने से बड़े खुश दिखाई देते हैं. जबकि उनके लिए ये चिंता का विषय होना चाहिए था. खेती को फायदेमंद बनाने में सबसे बड़ी बाधा है स्वदेशी बीजों का नाश करके जीएम बीजों की ओर बढ़ना. खेती को बढ़ाने के लिए सिंचाई की ज़रुरत को भुलाकर जीएम फसलों पर ज़ोर देने के कितने घातक परिणाम होते हैं, इसका किसी को अंदाज़ा ही नहीं है.

भारतीय विचारधारा के तीन आयाम हैं- राम,राष्ट्र और रोटी. राम आध्यात्मिक मूल्यों से लेकर राम मंदिर तक का विषय हैं. वो राष्ट्र संप्रभुता का विषय है. कश्मीर इसमें चुनौती बना हुआ है. राम मंदिर पर कुछ भी ना होना सरकार की प्राथमिकताओं के बारे में बताता है. अनारक्षित डिब्बे में पीने का पानी हो, ये प्राथमिकता है ना कि बुलेट ट्रेन. स्मार्ट सिटी प्राथमिकता नहीं हैं. जो 238 ज़िले आर्सेनिक और फ्लोराइड से प्रभावित हैं, वहां पेयजल पहुंचाना, भारतीय मॉडल के हिसाब से ये प्राथमिकता है. अभी लगता है कि अमीरों को लाभ और गरीबों को लोभ दिया जा रहा है.

राजनीति शास्त्र में सत्ता की स्थापना का उद्देश्य ही ये बताया जाता है कि राज्य का गठन निराश्रितों की रक्षा के लिए होता है. यहां उल्टा हो रहा है. राज्य की निरर्थकता अगर जनता के मन में बैठती है तो इससे अराजकतावादी ताकतों को फायदा मिलेगा. इसकी वजह से लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अपने रास्ते पर आगे बढ़ने की क्षमता दोनों बाधित होंगे.

282 सांसदों वाली पार्टी की सरकार की ऐसी क्या मजबूरी है कि ये हो रहा है?

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सरकार की कोई मजबूरी है, ये मैं नहीं मानता. मोदी जी की सरकार की नीयत भले ही अच्छी होगी लेकिन उनकी नीतियां, उनकी प्राथमिकताएं उपनिवेशवाद और अमेरिकीवाद से दूषित हैं, ऐसा ज़रुर लगता है.

बीजेपी के कुछ सांसदों, मंत्रियों और मार्गदर्शक मंडल या भारतीय मज़दूर संघ को देखें तो क्षोभ नज़र आता है. इसकी क्या वजह है?

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स्वदेशी जागरण मंच, भारतीय मज़दूर संघ और भारतीय किसान संघ, ये तीनों ही संघ की आर्थिक विचारधारा का प्रतिनिधित्व करते हैं. स्वदेशी जागरण मंच निराश है क्योंकि खुदरा व्यापार में विदेशी निवेश का प्रस्ताव निरस्त होने के बजाए आगे बढ़ाया गया है. मज़दूर संघ के लोग देख रहे हैं कि श्रम सुधार मज़दूरों के हक के खिलाफ जा रहे हैं. अनुबंध श्रमिकों का शोषण हो रहा है. काम और वेतन में कोई समानता नहीं है. इन बुनियादी बातों पर वो क्षुब्ध और क्रुद्ध हैं. इसी तरह भूमि अधिग्रहण को लेकर भारतीय किसान संघ के लोग ये समझा ही नहीं पा रहे हैं कि अध्यादेश लाने की क्या जल्दी थी. विषय-वस्तु पर तो बाद में बहस होगी. वीएचपी के लोग पूछ रहे हैं कि अगर आप ज़मीन अधिग्रहण पर अध्यादेश ला सकते हैं तो राम जन्मभूमि के मसले पर आपने क्या पहल की है? ये उस तबके की हताशा है जो सबसे ज़्यादा प्रतिबद्ध होकर चुनाव में सक्रिय रहा है. आज उसको अपने क्षेत्र में जवाब देना मुश्किल हो रहा है, ये कोई अच्छी बात नहीं है.

जहां तक आपने मार्गदर्शक मंडल की बात की तो जोशी जी ने कहा है कि गंगा में इकोलॉजिकल फ्लो सुनिश्चित किया जाए. उसके बिना गंगा अविरल नहीं होगी और अविरलता नहीं होगी तो निर्मलता कहां से आएगी? ये पहलू तो ठीक ही है. सरकार को गंगा के बहाव को बाधित नहीं करना चाहिए. गंगा के बहाव को निर्बाध करना ही होगा. गंगत्व का संरक्षण तभी होगा. पर्यावरण मंत्रालय कहता है कि जंगल की बात छोड़िए, पहले आदमी के रहने की ज़मीन हो. 5 करोड़ भूमिहीन लोगों के पास छत नहीं है. उन्हें आप ज़मीन देते…भूदान में ली गई ज़मीन का कब्ज़ा दिलाते. ऐसा नहीं हो रहा है. ज़मीन लेने की बात तो कर रहे हैं, देेने की बात कहीं से नहीं कर रहे. इन सब बातों से सरकार की छवि गरीब-विरोधी, किसान-विरोधी, जन-विरोधी बन रही है तो वो खुद ज़िम्मेदार हैं. शिक्षा, स्वास्थ्य, न्याय, मीडिया और लोकतांत्रिक प्रक्रिया, इन चारों क्षेत्रों में धन का प्रभाव बढ़ा है. सरकार का काम साधनहीनों के पक्ष में हस्तक्षेप करने का है. लेकिन सरकार इस दायित्व से पीछे हटती नज़र आ रही है.

सरकार में मंत्रालयों के वितरण पर सवाल उठते रहे हैं… सरकार ना तो संघ के एजेंडे पर चल पा रही है, ना संगठन की लीक पर. मंत्रालयों के मोर्चे पर भी कोई प्रतिबद्धता नहीं दिखती. ये असमंजस क्यों है?

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विचारधारा के प्रति प्रतिबद्धता का अभाव ही इन सबके लिए अंधेरे में टटोलने की मजबूरी पैदा कर रहा है. ये सभी अंधेरे में हल खोजने कोशिश कर रहे हैं. जबकि संवाद और विश्वास संगठन का आधार हैं. मूल समर्थक तो विश्वास और संवाद की पद्धति में ही रमे, पले हुए लोग हैं. यहां वो अभाव दिखाई पड़ता है. सभी असुरक्षा भाव से ग्रसित हैं, सभी मूक हैं. यहां बोलना मना है. ये किसी भी संगठन या सरकार के लिए अच्छा नहीं होता.

लेेकिन संघ की मजबूरी क्या है?

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संघ का अपना स्वभाव है. वो राष्ट्रहित को सोचकर पार्टी को सत्ता में लाने के लिए काम करता है. इस बार तो उन्होंने खुल्लमखुला सरकार के लिए प्रचार किया. मैं इसे ठीक नहीं मानता हूं. लेकिन उनका स्वभाव पवेलियन में वापस चले जाने का है. उनका मानना है कि बीजेपी में जो स्वयंसेवक हैं, उन्हीं का दायित्व है कि वो चीजों को ठीक करें. संघ का 15 फीसदी हिस्सा ही बीजेपी में सक्रिय रहता है. बाकी हिस्सा चुनाव जिताकर घर बैठ जाता है. लेकिन जनता तो उनसे कैफियत मांगती है. वही तबका सबसे पहले परेशान होता है. उसे समझ में नहीं आता कि चुनाव के बाद उसका रोल क्या है. फिलहाल संघ इसी भावमुद्रा से गुज़र रहा है. संघ परिवार के सूत्रों में शामिल है कि संगठन के मार्गदर्शन के लिए संगठन को जीना ज़रुरी है. ये कोई दूसरा संगठन नहीं कर सकता है. इसलिए संघ के स्वयंसेवक बीजेपी में लगे हुए हैं. स्वयंसेवक ही बीजेपी को सुधारने का काम करें ऐसी उम्मीद की जाती है. संघ का एक और सूत्र है कि धरातल पर मौजूद व्यक्ति ही वस्तुस्थिति को समझ सकता है. इसके कारण विवशता बनती है कि धैर्य ना खोया जाए. कई बार धैर्य ना खोने की इच्छा के कारण हालात इतने बिगड़ जाते है कि दुरुस्त नहीं हो पाते. इसका परिणाम चुनाव में आता है. लेकिन इससे भी ज्यादा राम, राष्ट्र और रोटी…तीनों संदर्भों में इसका नुकसान होता है. ये राष्ट्र के लिए चिंता का विषय है. संगठन तो आते और जाते रहेंगे.

बीजेपी के कुछ लोग विवादित बयान देते हैं….क्या ये कठोर हिंदूवाद की प्रतिछाया नहीं है?

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ये हल्की बातें हैं. ये सब ‘नादान की दोस्ती, जी का जंजाल’ जैसे बयान हैं. राजनीतिक क्षेत्र में हमेशा ज़्यादा बोलने की कम ज़रुरत होती है और कम बोलने की ज़्यादा ज़रूरत होती है. जब संघ परिवार के सभी लोग चुनाव में सक्रिय दिखेंगे तो बाद में ये कहना कठिन हो जाएगा कि हमें क्या मालूम ये तो बीजेपी वाले जानें. संघ परिवार के साथ जुड़े हुए लोगों के बयान भी इसमें शामिल माने जाएंगे. इसलिए सभी संगठनों की स्वायत्तता और परस्पर सहयोग के व्याकरण पर दोबारा चिंतन होना चाहिए.

बीजेपी के कुछ लोग विवादित बयान देते हैं….क्या ये कठोर हिंदूवाद की प्रतिछाया नहीं है?

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ये हमेशा कहा जाता है कि धीरे-धीरे जल्दी चलो. मूल अधिष्ठान पर रहकर जल्दी चलो फिर चाहे गति कम भी हो. राजनीति मैराथन है. इसमें स्पीड से ज़्यादा स्टेमिना की ज़रूरत होती है. सांस ना उखड़ जाए, इसकी चिंता करनी चाहिए. इसलिए संवाद, विश्वास, सत्ता का विकेंद्रीकरण, सहभागिता ज़रूरी हैं. देश में संवाद का वातावरण बनना चाहिए. इकतरफा बातचीत से काम नहीं चलेगा. अभी साढ़े तीन वर्ष और हैं. जनादेश पांच साल का मिला है. आज़ादी के बाद पहली बार एक गैर-कांग्रेसी व्यक्ति और दल ने अपने बूते पर बहुमत हासिल किया है. उम्मीदें बहुत ज़्यादा हैं. ये प्रयोग असफल नहीं होना चाहिए. ये पूरे संघ परिवार की ज़िम्मेदारी है. संघ के भीतर भी विशेष तौर पर बीजेपी नेताओं की. और सबसे अधिक प्रधानमंत्री की. मैं उनके प्रति अच्छे भाव रखता हूं. पुराने मित्र हैं. मैं चाहूंगा कि वो देश के लिए अच्छा करके दिखाएं. लेकिन ज़्यादा समझदारी बरतने की ज़रुरत है. ऐसा मुझे लगता है.

क्या बीजेपी में विचार करने की गुंजाइश बची है, अपने सिद्धांतों और आदर्शों के पुनर्पाठ की गुंजाइश…. जब आप देखते हैं कि उनके साथ पासवान भी और पीडीपी भी… और वो औरों के साथ भी जा सकते हैं?

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बीजेपी को गठबंधन की मानसिकता से उबरना चाहिए. बहुमत के मद्देनज़र विचारधारा के रास्ते पर ज़्यादा स्पष्टता से चलना चाहिए. अभी भी पार्टी चुनावी आग्रहों से उबरी नहीं है. वो अब भी चुनाव प्रचार की मानसिकता में हैं. सिर्फ सरकारें बनाकर तमगा पहन लेना पर्याप्त नहीं है. अब पूर्ण बहुमत की सरकार के विश्वास के साथ काम करने की ज़रुरत है.

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स्रोतपाणिनि आनंद
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