loading...

620-1

loading...

खीचो ना कमानो को न तलवार निकालो
गर तोप मुकाबिल हो तो अखबार निकालो

याद रहे की तलवार की सीमाएं है और दायरा भी, पर अखबार का दायरा असीम है। शायद यही कारण है कि पत्रकारिता को लोकतंत्र का चौथा स्तम्भ कहा गया है। मेरी समझ से पत्रकारिता राष्ट्रीय चेतना की सहगामी है या अगर मैं इसकी सरल शब्दों में व्याख्या करूं, तो पत्रकारिता का लक्ष्य था या रहेगा कि देश के भीतर स्वाभिमान और आत्मगौरव के भाव भरना, जनता की सोई हुई ताकत को जगाना।

टाइम्स ऑफ इंडिया के रविवार संस्करण संडे टाइम्स की शीर्ष पंक्ति इतनी निम्न है कि आतंकवादियों को बागी संबोधित करती उनको सम्मान देती प्रतीत होती है। वहीं मुठभेड़ में अपने प्राण गवाने वाले सैनिकों को शहीद बतलाने में उनकी स्याही फीकी पड़ जाती है।

आतंकवादी और बागी शब्द में अंतर या परिभाषा की बात यहां पर नही करूंगा, क्योंकि यह मुद्दा ज़रा बड़ा है और इस पर बहस भी लंबे समय से चलती ही आ रही है। और बहस की ज़रूरत भी है। पर मुझे जो इनमें बड़ी खाई दिखती है, वह निश्चित रूप से इन दोनों ही पक्षों के द्वारा बनाए गए माहौल से है। बागी को जहां तक मैं अवाम की आवाज़ समझता हूं, वही आतंकवाद वह शोर है जो अमन के बीच इंसानियत को भुला कर हथियार लिए खड़ा है।

इसे मैं पत्रकारिता का ‘एरर ऑफ कमिशन’ या संपादकीय त्रुटि नही कहूंगा। क्योंकि अगर मैं एक अख़बार हूं या पत्रकारिता से जुड़ा हूं, तो निश्चित रूप से मेरे कुछ समाजिक और पत्रकारीय दायित्व होंगे। जिसे निर्वाह के अलावा और कोई विकल्प हो ही नहीं सकता।

साथ में अगर आप पाठक हैं, तो आपका भी कुछ दायित्व बनता है। अब आप पाठकों को इसके खिलाफ बोलना चाहिए। अगर आपको यह सामान्य लगता है, तो समस्या आपके साथ भी है और इसके शिकार आप भी होंगे। अगर आप भी किसी विचार या नीति का विरोध करते हैं तो आपके खिलाफ भी इस अखबार में छप सकता है कि आप आतंकवादी हैं। क्योंकि इस खेल के नियम तो पहले से ही तय हैं। जो दायित्व का नियम है, उसे वर्षों से हम नज़रअंदाज़ करते ही आ रहे हैं।

आगे पढ़े – अगले दिन टाइम्स ऑफ इंडिया में एक स्पष्टीकरण लेख छपता है, जिसे पढ़ कर आप और भी हैरान हो सकते हैं।

1 of 2
CLICK ON NEXT BUTTON FOR NEXT SLIDE

loading...
शेयर करें