रिपोर्ट पढ़िये: भारतीय मीडिया का ज्ञान कितना घटिया है, देश की असलियत से कितने कटे हुए हैं….

इसके अलावा गांव देहातो में भी बड़े पैमाने पर अवैध कटान होने लगा। पूरे क्षेत्र में रोजाना इतने महिषवंशी पैदा नही होते थे जितने कट जाते थे। 

पिछले एक दशक में भैंस चोरी बहुत विकराल समस्या बन गई पश्चिमी उत्तर प्रदेश के गाँवों में। भैंस चोरों को पुलिस प्रशासन का पूरा संरक्षण मिलता था। इनके हौसले इतने बुलंद होते थे कि ग्रामीणों द्वारा पकड़े जाने की स्थिति में सीधे गोली मारते थे। आए दिन कोई न कोई ऐसी वारदात होती थी जो साम्प्रदायिक रूप ले लेती थी। जो गांव इससे सबसे ज्यादा पीड़ित थे उन्होंने जाती धर्म ना देखकर इस बार एकतरफा भाजपा को वोट दिया है। वो तो बिसाहड़ा बड़ा मुद्दा बन गया, नही तो बिसाहड़ा जैसे कितने काण्ड हुए !

प्रशासन के एकतरफा भेदभावपूर्ण रवैये की वजह से जनता असहाय थी।
इन सब का डेयरी उद्योग पर बहुत भयावह प्रभाव पड़ा। सिर्फ एक दशक में ही भैंस की कीमत 7-8 गुना बढ़ गई। इसके मुकाबले दूध की कीमत उतनी नही बढ़ी। दुधारू पशुपालन जो कि गरीब किसानों के लिये आय का सबसे बढ़िया वैकल्पिक स्त्रोत होता था वो घाटे का सौदा हो गया। भैंस पालना गरीब किसान के लिये रिस्की काम हो गया। कसाईयो द्वारा भैंसों को जहर देने और सुबह 40-50 हजार के बदले भैंस का शव लेने पहुँच जाना आम है। गाँवों में पशुपालन पहले की तुलना में बहुत कम हो गया। गाँव तक में दूध मिलना मुश्किल हो गया है।

दुग्ध उत्पादन बढ़ने के जो सरकारी दावे किए जाते हैं वो किस आधार पर किये जाते हैं पता नही ! जबकि असलियत यह है कि पश्चिमी उत्तर प्रदेश में दूध से ज्यादा खून की नदियां बह रही हैं। गुजरात में आनंद के बाद सबसे ज्यादा दूध का उत्पादन बुलंदशहर जिले में होता था आज ये नकली दूध के कारोबार में पहले नंबर पर है।

इस डेढ़ दशक के दौर में अगर मायावती और यादव कुनबे के अलावा कोई संपन्न हुआ है तो वो सिर्फ कसाई हैं जो रातोरात करोड़पति और अरबपति हो गए। अब तो मुस्लिमो में दूसरी जाती के लोग भी ये काम करने लगे हैं जबकि आम किसान इससे बरबाद ही हुआ है।

इसके अलावा पर्यावरण और लोगो के स्वास्थ्य को इस कटान ने जबरदस्त प्रभावित किया है। हजारों वैध और अवैध कमेलो में से किसी में भी अपशिष्ट पदार्थ के उन्मूलन की कोई व्यवस्था नही। कटे हुए अंग अवशेष और खून नदी नालों में बहा दिए जाते। खून groundwater में मिल उसे दूषित कर देता। सैकड़ो गाँवों के लोगो का जीना दूभर हो गया। तरह-तरह की बीमारियों से ग्रस्त होने लगे। हर जगह वो लोग फ़रियाद करते लेकिन किसी के कानों पर जूं नही रेंगी। ना तो राज्य सरकार, ना केंद्र सरकार, ना ग्रीन ट्रिब्यूनल और ना ही पर्यावरणवादी एनजीओ। ये बहुत बड़ा और तेजी से बढ़ता उद्योग था जिसमे सब हाथ साफ करना चाहते थे।

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