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असम के लोग तीन महान व्यक्तियों का बहुत सम्मान करते हैं। प्रथम, श्रीमंत शंकर देव, जो १५ वी शताब्दी में वैष्णव धर्म के महान प्रवर्त्तक थे। दूसरे, लाचित बरफुकन, जो असम के सबसे वीर सैनिक माने जाते हैं। और तीसरे, लोकप्रिय गोपी नाथ बारदोलोई, जो स्वतन्त्रता संघर्ष के दौरान अग्रणी नेता थे।

औरंगजेब जब दिल्ली का बादशाह बना तो उसने पश्चिम असम पर आक्रमण कर उसे अपने कब्जे में कर लिया, और रसीद खां को वहां के प्रतिनिधि के रूप में नियुक्त किया। लेकिन अहोम के राजा चक्रध्वज सिंह (1663-1669) को मुगलों के अधीन रहना स्वीकार नहीं था। चक्रध्वज सिंह ने मुगलों से लडने के लिए सेना का पुनर्गठन कर नौ शक्ति को बढ़ाया और अपने मंत्री मोमाई तामुली बरबरूवा के पुत्र लाचित को अपना बरफुकन (सेनापति) बनाया। और पूरी तैयारी के साथ मुगलों पर आक्रमण कर अगस्त १६६७ में असमी सेना ने गुवाहाटी में पुन: प्रवेश कर मुगलों को मनाह नदी के पार खदेड दिया ।

lachit badfukan

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उधर मराठा वीर शिवाजी महाराज के आगरा दुर्ग से पलायन करने से मुगल बादशाह औरंगजेब परेशान था, इधर असम में हुई मुगलों की हार से वह और तिलमिला गया। उसे सन्देह था कि शिवाजी के पलायन में आमेर के मिर्जा राजा जयसिंह के पुत्र रामसिंह ने सहायता की है। परन्तु वह उसे प्रत्यक्षरूप से सजा देता तो राजपूत सेना में विद्रोह का भय था, इसलिए उसने रामसिंह को असम जैसे खतरनाक मोर्चे पर भेज दिया। पटना से रामसिंह बंगाल के नवाब और औरंगजेब के मामा शाहस्ता खां से ढाका जाकर मिला और उसकी भी सैन्य सहायता ली। मुगलों की हार को जीत में बदलने के लिए वह धुबरी के रंगामाटी पर अधिकार कर १६६९ ई. में गुवाहाटी के उत्तर पार अठियाठरी पहाड तक आ पहुंचा।

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