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दीपक चौरसिया के साथ आम आदमी पार्टी ने जो किया उसे गुण्डागर्दी ही कहना होगा! यह आतंकित करने वाला प्रकरण है।

Awadhesh Kumar
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किसी गुण्डे या दादा के काम करने का तरीका क्या होता है? यही न कि वह धमकी देता है कि मेरी बात मानो नही तो तुम्हारा बुरा हाल कर दूंगा। वह अपनी शक्ति और सोच के अनुसार ऐसा करत भी है। आम आदमी पार्टी के नेता और दिल्ली सरकार में मंत्री कपिल मिश्रा ने जाने माने पत्रकार दीपक चौरसिया के साथ यही किया है। दिल्ली में चिकनगुनिया एवं डेंगू ने जिस ढंग से महामारी का रुप लिया है उसके सामने स्वास्थ्य ढांचा की शर्मनाक लाचारगी ही प्रमाणित नहीं हो रही, केजरीवाल सरकार की संवेदनहीनता और अक्षमता भी सामने आ रही है। इस पर बहस करना, इसे सामने लाना हर पत्रकार की जिम्मेवारी है और पत्रकार ऐसा कर भी रहे हैं। इसी कड़ी में दीपक चौरसिया अपने इंडिया न्यूज पर एक बहस करा रहे थे जिसमें उन्होंने सच का आईना दिखाने के लिए असुविधानजनक प्रश्न पूछे। इससे गुस्साए मिश्रा ने ट्विट्टर पर उनका नंबर सार्वजनिक कर अपने समर्थकों को यह छूट दी कि उनको परेशान करे।
उसके बाद लगातार रात भर दीपक चौरसिया के नंबर पर गालियां और धमकी आतीं रहीं।  इस व्यवहार को आप क्या कहेंगे? आप हमारे मन के अनुरुप खबरें दिखाइए, विचार प्रकट करिए या करवाइए नहीं तो हम उसकी सजा आपको देंगे। एक राजनीतिक दल और उसमें भी मंत्री का यह रुप किसी गुंडा या दादा से अलग नहीं माना जा सकता है। आप पत्रकारों को डराना चाहते हैं ताकि दूसरे खुलकर आपकी कमजोरियां, आपकी विफलताएं, आपके झूठ, आपकी धोखाधड़ी, आपकी अकर्मण्यता-अयोग्यता पर न बोले न लिखे। हालांकि यह हैरत की बात है कि उस दिन ज्यादातर चैनलों पर यही बहस चल रही थी और सबमें केजरीवाल सरकार की तीखी आलोचना हो रही थी। फिर निशाना केवल दीपक चौरसिया को क्यों बनाया गया? मैं स्वयं लोकसभा टीवी पर था और मैंने भी उनके नेता के सामने उतनी ही आलोचना की। ऐसी महामारी में अपनी भूमिका निभाने की जगह अगर आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार कहेगी कि एमसीडी काम नहीं कर रही, हमारे मन के अनुरुप अफसर नहीं मिले रहे, एल जी साहब से जाकर पूछिए हमारे पास अधिकार ही क्या हैं तो उसकी आलोचना होगी ही। टाइम्स नाउ पर तो अर्नब गोस्वामी ने आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार की धज्जियां उड़ा कर रख दिया था।
जैसे किसी राजनीतिक पार्टी को एक दूसरे का विरोध करने या समर्थन करने का अधिकार है वैसे ही देश के हर नागरिक का है। उस नागरिक में पत्रकार भी शामिल हैं। पत्रकार का तो विशेष दायित्व है कि वह जनता के हित को ध्यान में रखकर निर्भय होकर गलत कार्य को सामने लाए, उसका विरोध करे। लोकतंत्र मंें राजनीतिक दलों से इतनी सहिष्णुता की अपेक्षा की जाती है कि वो इसके विरुद्व किसी तरह की बदले की कार्रवाई न कर अपने में सुधार करें। आम आदमी पार्टी का रवैया हमेशा इसके विपरीत रहा है। वो आलोचना करने वालों को अपना दुश्मन मानकर चलते हैं और उनके साथ असहिष्णु व्यवहार करते हैं।
अरविन्द केजरीवाल ने खुद यह बयान दिया था कि अगर वे सत्ता में आए तो पत्रकारों की जांच करवाकर जेल भिजवाएंगे। यह भी एक धमकी थी ताकि डर से उनके खिलाफ आवाज न उठे। सरकार में आने के बाद पत्रकारों के कामों पर नजर रखने के लिए उन्होंने एक ढांचा भी खड़ी करने की कोशिश की थी लेकिन बाद में उसे रोक देना पड़ा। जरा सोचिए, ऐसी पार्टी जिसे एक समय सबसे ज्यादा मीडिया का समर्थन मिला। मीडिया ने जिस नेता को देश का हीरो बनाया, उसकी एक-एक गतिविधि को व्यापक कवरेज दिया, उसका ऐसा व्यवहार है।

 

केजरीवाल ने 526 करो़ड़ रुपए के विज्ञापन के बजट से ऐसा लगता है पत्रकारिता को ही खरीदने की कोशिश की। भारतीय पत्रकारिता में गिरावट आई है लेकिन उसमें अभी ईमानदार, निर्भीक और सच्चाई के लिए अपना कैरियर और जीवन दांव पर लगाने वाले भी हैं। आप उनको खरीद नहीं सकते।
दीपक चौरसिया के बारे में उनके विरोधियों ने हमेशा दुष्प्रचार किया है। मैंने निकट से उनको देखा है। खबरों और विचार में वे जानबूझकर कभी पक्षपात नहीं करते। उनके डिबेट में जो गेस्ट होते हैं उनको बोलने का पूरा मौका वो देते हैं। कभी अपना ज्ञान नहीं बघाड़ते। डिबेट में उनसे आप कितना भी असहमत हो जाइए, उनको कुछ भी कहिए उसको कभी मान-अपमान की तर्ज पर नहीं लेते। आपको लगेगा कि आपने इतना विरोध कर दिया अगली बार आपको वे डिबेट में नहीं बुलाएंगे लेकिन ऐसा नहीं होता। आपको फिर बुलावा आएगा। अगर कोई अपना पक्ष रखते समय गलत तथ्य रखेगा तो उसे टोकना तो पड़ेगा, कई बार रोकना भी पड़ता है। इससे कोई नेता या राजनीतिक दल निहायत ही दादागिरी पर उतर जाए तो उसे क्या कहा जाएगा इसका फैसला आप करिए?
आम आदमी पार्टी ने जो किया वह निश्चय ही उसकी फासिस्ट प्रवृत्ति को उजागर करता है। यह आतंकित करने वाला व्यवहार है। जरुरी है कि ऐसे व्यवहार का एक स्वर से केवल निंदा नहीं पुरजोर विरोध हो ताकि पुनरावृत्ति न हो। पत्रकारिता को किसी भी अवस्था में स्वतंत्र और भयमुक्त वातावरण चाहिए। आम आदमी पार्टी और केजरीवाल सरकार भयुक्त वातावरण मीडिया के सामने बनाए रखना चाहती है।
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