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केसर देवी (सामाजसेवी)

नई दिल्ली। जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का विवाद अब अफजल गुरु से आगे ‘गुरुजी’ तक पहुंच चुका है। एक बुद्धिजीवी ब्रिगेड महज इस बात से खुश है कि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार तो कर लिया गया है, पर उसके खिलाफ अदालत में मामला टिकेगा नहीं, क्योंकि 1962 में राष्ट्रदोह से जुड़े कानून में परिवर्तन कर ये बात जोड़ी गई थी, कि केवल राष्ट्रविरोधी बात कहने या नारे लगाने से ही अपराध नहीं मान लिया जाएगा, बल्किे उसके लिए जरूरी है कि ऐसी बात या नारे के परिणामस्वरूप कोई हिंसा हुई हो, अब इस मामले में हिंसा तो हुई नहीं है, तो कन्हैया अदालत से बरी हो जाएगा।

इसमें भी कोई शक नहीं कि राष्ट्रद्रोह का ये कानून 1860 में अंग्रेज़ों द्वारा बनाया गया था और हमारे स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के ख़िलाफ इसका जमकर इस्तेमाल हुआ। गांधी जी और तिलक तक को इसी के तहत जेल हुई। एक समय में ख़ुद नेहरू ने 124-ए का विरोध किया था। ठीक ऐसा ही इस देश में बलात्कार के कानून के साथ भी हुआ है। निर्भया के पहले तक बलात्कार का इरादा कोई मायने नहीं रखता था, जब तक कि बलात्कार हो ना जाए। उसे नए कानून में बदला गया है। असहमति की गुंजाइश वहां भी है।बुद्धिजीवी ब्रिगेड महज इस बात से खुश है कि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार तो कर लिया गया है: केसरजवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय का विवाद अब अफजल गुरु से आगे ‘गुरुजी’ तक पहुंच चुका है। एक बुद्धिजीवी ब्रिगेड महज इस बात से खुश है कि जेएनयू छात्र संघ के अध्यक्ष कन्हैया कुमार को गिरफ्तार तो कर लिया गया है।

यकीनन राजनीतिक विद्वेष के लिए भी राष्ट्रद्रोह के इस कानून का इस्तेमाल होता आया है। एक समय में पृथक झारखंड के लिए लड़ने वाले आदिवासियों पर भी ये कानून लगाया गया था। असीम त्रिवेदी, अरुंधति रॉय और बिनायक सेन अन्य उदाहरण हैं। लेकिन देशद्रोह के इस कानून को लेकर सवाल उठाने वाले क्याअ इन सवालों को समझ रहे हैं, जो इस पूरे प्रकरण के बीच देश की वर्तमान परिस्थिातियों और हालात के बीच उठ रहे हैं।

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