loading...
कश्‍मीर के इस महान संत को दुनिया ने किया नमन, क्‍या आप जानते हैं इन्‍हें..?
loading...
आशीष अंशु ब्लॉगर के बारे में जनसरोकार की पत्रकारिता के चंद युवा चेहरों में से एक। सोपान नाम की एक पत्रिका के लिए पूरे देश में घूम-घूम कर रिपोर्टिंग करते हैं। मीडिया के छात्रों के साथ मिल कर मीडिया स्कैन नाम का अखबार निकालते हैं।

जम्मू-कश्मीर के शैव दर्शन के प्रतिनिधि व्याख्याकार आचार्य अभिनव गुप्त का यह सहस्त्राब्दी वर्ष चल रहा है। श्री गुप्त के चिन्तन में भारतीय दर्शन की विभिन्न धारा आगम-निगम, योग-सौन्दर्य, ब्रम्ह-जगत, शैव-शाक्त सबके लिए जगह है। उनके चिन्तन में ब्रम्ह और जगत के बीच कोई अंतर नहीं है। वे जगत को ब्रम्ह का ही विस्तार मानते हैं।

बताया जाता है कि कश्मीर में बड़गाम के पास भैरव गुफा में वे समाधी में गए। वह गुफा आज भी विद्यमान है। अभिनव गुप्त रचित अभिनव भारती, लोचन जैसी कई रचनाएं अब भी उपलब्ध हैं। यह सच है कि अभिनव गुप्त के रचना संसार की अब तक प्रामाणिक समीक्षा नहीं हो पाई है। बताया जाता है कि उन्होंने अपने जीवन काल में 44 ग्रंथों की रचना की। आचार्य के जीवन पर शोध करने वाले विद्वान नवजीवन रस्तोगी कहते हैं कि कश्मीरियत में जो सूफिज्म है, वह अभिनव गुप्त की परंपरा से आया है।कश्‍मीर के इस महान संत को दुनिया ने किया नमन, क्‍या आप जानते हैं इन्‍हें..?ऐसे आचार्य अभिनव गुप्त के सहस्त्राब्दी समारोह का आयोजन 13 फरवरी को विज्ञान भवन में हुआ। आयोजन में अध्यक्षता आर्ट ऑफ लिविंग के संस्थापक श्री श्री रविशंकर ने किया। आयोजन में भारत सरकार में मंत्री डॉ जितेन्द्र सिंह और किरन रिजीजू शामिल रहे। हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहरलाल खट्टर, ब्रिटिश सांसद बॉब ब्लैकमेन, हिन्दू धर्म आचार्य सभा से स्वामी परमात्मानंद सरस्वति उपस्थित थे। आयोजन में अभिनव गुप्त पर जम्मू-कश्मीर अध्ययन केन्द्र के अध्यक्ष पद्मश्री जवाहर लाल कौल की लिखी किताब अभिनवगुप्त एंड शिवा रिनेजेन्स’ का लोकार्पण भी हुआ।

बात आचार्य के जीवन वृत की करें तो उनके पूर्वज अत्रिगुप्त (8वीं शताब्दी) में कन्नौज के निवासी थे। कश्मीर के राजा ललितादित्य ने जब 740 ई में कन्नौज (कान्यकुब्ज प्रदेश) को जीतकर कश्मीर में मिला लिया, तो राजा ललितादित्य ने अत्रिगुप्त से कश्मीर चलने का आग्रह किया। वितस्ता (झेलम) नदी के किनारे भगवान शितांशुमौलि (शिव) के मंदिर के सम्मुख एक विशाल भवन अत्रिगुप्त के लिए बनवाया गया। इसी परिवार में लगभग 200 साल के बाद दसवीं शताब्दी के मध्य में आचार्य अभिनवगुप्त का जन्म हुआ। आचार्य के पिता का नाम नरसिंहगुप्त और मां का नाम विमला था। अपनी मां को आचार्य अपने ग्रंथों में श्रद्धा से विमलकला के नाम से स्मरण करते हैं।कश्‍मीर के इस महान संत को दुनिया ने किया नमन, क्‍या आप जानते हैं इन्‍हें..?आचार्य के संबंध में जानने वाली बात यह है कि इटली में रोम विश्वविद्यालय, ब्रिटेन में ऑक्सफोर्ड, अमेरिका में शिकागो और फ्रांस में सबर्न सहित विश्व के 50 से अधिक विश्वविद्यालयों में आचार्य अभिनवगुप्त पर शोध हुए हैं। इटली के साहित्यकार अम्बरतो ईको, रूस के थियोडोर तोदोरोव, पोलैंड के प्रो ब्रिस्की, रोम के प्रोफेसर रॉफेल तुरेला आदि ने अपना पूरा जीवन ही आचार्य के साहित्य के अध्ययन और उनके साहित्य पर शोध को समर्पित कर दिया है। दुख की बात हम लोगों के लिए यह है कि इस भारतीय महापुरुष के संबंध में कितना कम जानते हैं हम सब।

CLICK ON NEXT BUTTON FOR NEXT SLIDE

loading...
शेयर करें