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जिनके पास फालतू का समय है, इसे पढकर अपना टाइम पास कर सकता वरना अपना समय अपने कर्मों को दें

(ये पोस्ट मेरे व्यक्तिगत जीवन की एक घटना का वर्णन है, इसमें ऐसा कुछ भी नहीं है जो आज आपको देश की कोई खबर या घटना की जानकारी दे, जिनके पास भी फालतू का समय हो तो इसे पढकर अपना टाइम पास कर सकता वरना आप अपना समय अपने कर्मों को दें)

साल २०१२ तारीख ३ अप्रैल, मै होशंगाबाद जाने के लिये तैयार हो रहा था। वहां ४ तारीख को ऐयरफोर्स की रैली भर्ती थी जिसमे ग्वालियर के लडकों को भी बुलावा भेजा था। मेरे साथ मेरा एक मित्र भी था। मेरी तैयारी पूरी थी, मैने जरूरी कागज रख लिये थे। ये पहला मौका था जब मेरे साथ सफर में कोई घर का सदस्य नही था। मै अपने आप को स्वतंत्र महसूस कर रहा था।

शाम को हम जीटी एक्सप्रेस से रवाना हुये। छः घन्टे के उस सफर मे मै पूरे रास्ते राजीव दीक्षित जी के व्याख्यान सुने। उन दिनों मुझ पर राजीव दीक्षित के व्याख्यानों का बुखार चढा हुआ था। एक बार उनकी रामकथा सुनने के बाद मेरे भाई ने दिल्ली के पुस्तक मेले से मुझे १२ सीडी लाकर दी थी, जिन्हें बाद मे मैने कौपी करके चाणक्य सीरीयल के डायरेक्टर श्री चन्द्रप्रकाश द्वीवेदी जी उपहार स्वरूप भेंट दे दी थी। मेरे मोबाइल का चार जीबी कार्ड उनके व्याख्यानों से भरा हुआ था।

सोने से पहले तो राजीव दीक्षित, सोकर उठने के बाद राजीव दीक्षित, कौलेज जाते समय बस मे राजीव दीक्षित, कौलेज से आते समय राजीव दीक्षित, खाना खाकर टहलने के वक्त राजीव दीक्षित, शाम को घूमकर आने के बाद राजीव दीक्षित, कभी उनके स्वास्थ वाले व्याख्यानों पर नोट्स बनाता, तो कभी उनके जैसे व्याख्यान देने की नकल करने के लिये उनके बताये आंकडों को डायरी मे उतारता। मै उनके व्याख्यानों को इतना समय देता था मानो मेरे कान उन्ही के व्याख्यान सुनने के लिये बने हों।

हम सुबह करीब चार बजे होशंगाबाद पहुंचे। मैदान पहुंच कर हमने देखा वहां बहुत भीड थी, टोकन लेने के लिये मरामारी चल रही थी। पुलिस बार बार लाठी चार्ज कर रही थी। मै पीछे आकर खडा हो गया। हम अपना सामान रखने के लिये वापस स्टेशन आये जहां एक होटल वाले ने हमारा सामान निशुलक ही रख लिया। हम नौ बजे करीब दोबारा भर्ती वाले मैदान पहुंचे। वहां लाइन मे लग कर हमने टोकन लिया। हमे अपना नंबर देखकर अंदाजा लग गया की हमारा नंबर शाम के छः बजे तक आयेगा।

तब तक के लिये हम अपना सामान उठा कर चल दिये मां नर्मदा के सेठानी घाट की ओर, मेरे पिताजी ने मुझे वहां नहाने के लिये सख्त मना किया था क्योंकि पिछले वर्ष हमारे पडोस के एक लड्के की यहां डूबने से मृत्यु हो गयी थी, वो भी वहां भर्ती देखने आया था। जब हम पहुँचे तब भी वहां दो घटना तुरंत ही हुई थी जिनमे दोनों की मौत हो गयी थी। मैने वहां मा नर्मदा को प्रणाम किया और दूर सीढीयों पर बैठकर चुपचाप उस नदी का संगीत सुनने लगा। वो मादक हवा मुझे पवित्र कर रही थी।

जब सब अपने कागज दिखाने के लिये तैयार करने लगे तो मिलान करते समय मुझे पता चला के मै बारवीं का पासिंग आउट सर्टिफिकेट तो लेकर आया ही नही। ऐसा नही है मैने पहले मिलान नही किया था, घर पर मैने अपने मित्र के पास ये सर्टिफिकेट देखा था पर मैने इसे तब महत्व नही दिया। इस सर्टिफिकेट की जानकारी के आभाव के कारण मैने ये पत्र अपने स्कूल से अभी तक लिया भी नही था। पर अब मै भर्ती के लिये अयोग्य था। चार बजे हमे प्रवेश लेना था, वहां पर कागज जांच करने वाले अधिकारियों ने मेरे पास वो पत्र ना देखकर मुझे प्रवेश नही दिया।

मै निराश होकर वापस सेठानी घाट आने लगा। पौने तीन घंटे मे मैने होशंगाबाद क ८०% क्षेत्र नाप दिया था। वहां उस समय सर्राफा वालों की हडताल चल रही थी। होटल बंद होने के कारण वो व्यापारी लोग ही वहां भर्ती देखने आये लडकों के लिये निशुल्क भंडारा खिला रहे थे। वहां थोडा खाना खाने के बाद मै सेठानी घाट पहुंच गया। मां नर्मदा की आरती का समय हो गया था। सुबह के मुकाबले अब यहां द्स गुना भीड थी।

आरती होने के बाद मे शांति की तलाश के लिये मै वहां मां नर्मदा के सौंदर्य को निहारने लगा। थोड़ी देर बाद वहाँ पर एक बाबा को भीड़ ने घेर लिया। उत्सुकतावश मैं भी वहाँ गया। आसपास के लोगों से पूछने पर पता चला कि ये बाबा नर्मदा के जंगलों में तप करते हैं और अभी शहर भ्रमण पर आये हुए हैं कोई उन्हें तांत्रिक कह रहा था तो कोई संत। वो वेशभूषा से एक साधारण साधु दिख रहे थे। धूल चढ़े हुए बालों की जटा कमजोर शरीर , सुंदर नवीन भगवा धोती , बहुत पुरानी सी चप्पल और हाथ में एक टेडी मेडी पुरानी डंडी। बाबा ने पिछले ३२ सालों से मौन व्रत रखा था। लोग उन्हें अपने मरे हुए रिश्तेदारों की फोटो दिखा रहे थे और उनकी गति की अवस्था के बारे में पूछ रहे थे। बाबा अपने हाथ में रखे काले चपटे सिलेनुमा पत्थर पर उनके जवाब संकेत रुप में दे रहे थे। वहाँ बैठे एक व्यक्ति ने मुझे बताया कि बाबा ने अपना आज्ञाचक्र सिद्ध कर लिया है, ये उनकी कुण्डलिनी शक्ति है जो उन्हें समय के आर पार यात्रा कराती है। मुझे ये सब कोरी बकवास और नौटंकी लग रही थी। वहाँ पर भीड़ बढती जा रही थी। मुझसे पहले एक युवक ने अपने लडके का फोटो दिखाकर पूछा कि अब इसकी आत्मा कहाँ है बाबा ने बताया कि वो अभी अपने सूक्ष्म शरीर में रहकर तुम्हारे घर के बाहर ही भटकता है।

उस भीड़ में मुझे देखकर बाबा ने अचानक ही मुझे मेरे नंबर से पहले ही बुला लिया। पर मेरे पास कोई ऐसे मेरे मरे हुए रिश्तेदार की फोटो नहीं थी जिसे दिखाकर मैं उनके बारे पूछता पर ममैं इस मौके को बेकार नहीं जाने देना चाहता था। मेरे कानों में चौबीस घंटे चलने वाली आवाज से मुझे प्रेरणा मिली। मेरे फोन मे राजीव दीक्षित जी की फोटो भी थी । मैंने बाबा को वह फोटो दिखाई, वो बाबा और लोगों की फोटो को देखकर कुछ समय लेते थे पर उन्होंने राजीव दीक्षित की फोटो देखकर ही अपनी वो पट्टिका उठायी और राजीव दीक्षित जी का जन्म स्थान तारीख , तिथि और देहवसान की तारीख स्थान सब थोड़ा थोड़ा करके लिख दिया। मेरा अगला प्रश्न था वो अब कहाँ हैं, उन्होंने बताया कि इसी साल(२०१२) मार्च के महीने में उनका जन्म हो चुका है।

उन्होंने धीरे धीरे करके सब बताया की उनका जन्म एक समृद्ध और सदाचारी बामन परिवार में हुआ है जिनका निवास स्थान गुजरात प्रदेश में है। मेरे ऊपर सीट खाली करने का दबाव बढता जा रहा था। इतने में मैंने उनकी मृत्यु के बारे में पूछा की वो षड्यंत्र था या सब स्वभाविक ही हुआ था। इस पर उन्होंने कुछ बताने से मना कर दिया। मेरे याचना करने पर उन्होंने अपनी लकड़ी से एक गोला बनाया और बीच में उस लकड़ी को रख दिया। जिसका मतलब मैं आज तक नहीं समझ पाया हूँ। मेरा आखिरी प्रश्न उनसे यह था कि इस देश की सबसे बड़े दुश्मन कौन हैं??? और उनकी काट कौन है???समस्या पूछने पर बाबा ने अपनी लकड़ी से मेरे फोन को उलटा किया और अपनी डंडी से उसे टक टक करके बताया। उनकी डंडी से मेरे मोबाइल के कैमरा के पास का लेमिनेशन हट गया था। और समाधान पूछने पर बाबा ने अपनी मूंछ पर ताव मारा और हल्की मुस्कान के साथ मुझे विदाई दी। मैं वहाँ से उठने के बाद बहुत डरा हुआ था एक व्यक्ति दूसरे के बारे में इतनी जानकारी कैसे दे सकता है, मेरे रोंगटे खड़े हुए थे और धडकन बढी हुई मैंने अपने मन को समझाया कि राजीव दीक्षित एक बहुत प्रसिद्ध व्यक्ति थे इसलिए उनके बारे में इन्हें इतना कुछ पता होगा।

मैंने नदी के ठंडे पानी से अपना मुंह धोया और अगले दिन उन्हीं व्याख्यानों को सुनता हुआ अपने घर आ गया उसके बाद में अगले दिन दो तीन लोगों की फोटो लेकर फिर गया इस बार में पासिंग सर्टिफ़िकेट भी लाया था मैं नौनटेक्निकल भर्ती देखने आया था। पर अब वो बाबा मुझे नहीं मिले उसके बाद फिर में इसी साल भोपाल गया था तब होशंगाबाद भी गया पर अब भी वो बाबा मुझे नहीं मिले उस समय जो हुआ वो सब संयोग ही था शायद मेरे शोक की अग्नि को ठंडा करने के लिये।

वो पूरा वर्ष (२०१२) मेरे जीवन का सबसे आश्चर्यजनक वर्ष रहा है, उस वर्ष में मैंने बहुत कुछ सीखा। ऐसी कई घटनाएं मेरे जीवन में उस वर्ष हुई जिन्होंने मेरे आगे के जीवन को नई दिशा दी है। आगे किसके जीवन में क्या होगा ये कोई नहीं जानता। उन घटनाओं से प्रेरित होकर जो मैंने कुछ उद्देश्य तय किये थे उनको पूरा करने के लिये सोशल मीडिया का प्रथम चरण पूरा होने को है जिसमें मै नये नये महानुभावों से परिचित हुआ देश का मिज़ाज जाना यहाँ की हकीकत जानी। अब १० फरवरी को यहां से(fb/WA/twitter) सन्यास लेकर दूसरे चरण के लिये गीयर डालूंगा।
आत्मा कभी मरता नहीं है परन्तु शरीर जरूर मरता है वो सूक्ष्म हो या स्थूल। राजीव दीक्षित को अगर आत्मा मानते हो तो ना राजीव कभी जन्मे थे और ना कभी वो मरे हैं। ये हमारी बेवकूफी है की हम उसको गया हुआ मान लेते हैं।

एक स्वदेशी समर्थक : निर्भयनादी मनीष

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