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आज एक मित्र ने बड़े शान से मुसलमानों में बुर्के और हिन्दुओं में घूंघट का महत्त्व समझाते हुए कहा कि मर्दों की गंदी और कामुक नज़र से बचने का स्त्रियों के पास यह आज़माया हुआ तरीक़ा है, इसीलिए हमारे धर्मगुरुओं ने जवानी की दहलीज़ पर कदम रखती औरतों के लिए परदे की तजबीज की है।

औरतों के परदे से बाहर आकर स्कर्ट, जींस और टॉप जैसे विदेशी परिधान अपनाने के बाद ही समाज में कामुकता, बेहयाई और बलात्कार बढ़े हैं। मैंने कहा कि अगर समस्या मर्दों से है, तो सदियों से इसकी सज़ा औरतों को क्यों दी जा रही है ? खुद अंडरवियर और गमछे पहनकर पूरा टोला-मोहल्ला घूमने वाले आप मर्द औरतों को शालीनता के साथ भी अपनी पसंद के कपड़े पहनने से रोकने वाले कौन होते हो?

औरतों को सामान की तरह सात पर्दों में लपेट कर रखने से बेहतर तो यह होता कि हमारे धर्मगुरु जवानी की दहलीज़ पर कदम रखते ही दुनिया के सभी मर्दों की आंखें फोड़ देने का फ़रमान ज़ारी कर देते। कम से कम दुनिया की आधी आबादी तो सुरक्षित हो जाती। न कहीं छेड़खानी होती, न बलात्कार, न अश्लील और ब्लू फ़िल्में बनती और देखी जातीं और न अय्याशों के आगे डांस बार या कैबरे में औरत को नंगी-अधनंगी होकर नाचने की ज़िल्लत उठानी पड़ती।

रही बात मर्दों के अंधे होने के बाद घर-परिवार, समाज, देश और दुनिया को चलाने की तो यह कोई मुश्क़िल बात नहीं। घर चलाने की ज़िम्मेदारी हम अंधे मर्दों पर। मर्द अगर घर में रहें तो दुनिया से अपराध भी ख़त्म हो जाएंगे, आतंकवाद भी और बेमतलब के युद्ध भी। घर के बाहर का ज़िम्मा स्त्रियों को। यक़ीन मानिए, वे समाज, देश और दुनिया को हम मर्दों से बहुत बेहतर चला लेंगी।

इस लेख के विचार पूर्णत: निजी हैं  – ध्रुव गुप्त 

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