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भारतीय वैज्ञानिकों की दुनिया हुई दीवानी, इसरो से काम करवाने के लिए देशों में होड़, अमेरिका की उड़ी नींद..!

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इसरों ने अंतरिक्ष के क्षेत्र में एक बार फिर इतिहास रचते हुए दोबारा इस्तेमाल होने वाले प्रक्षेपण यान (आरएलवी–टीडी) का सफलतापूर्वक परीक्षण किया। इसका उद्देश्य प्रक्षेपण यान को अंतरिक्ष में ले जाकर उपग्रहों की कक्षा में स्थापित करने के बाद एक विमान की तरह वापस धरती पर आनें में सक्षम बनाना है, जिससे कि इसका बार –बार उपयोग किया जा सके। इससे उपग्रहों को प्रक्षेपित करनें के खर्च में दस गुना तक की कमी आएगी, बाद में इसके विकसित संस्करण की सहायता से इसे मानव मिशन में भी प्रयोग किया जा सकता है।

कुल मिलाकर यह भारत का पूर्ण स्वदेशी प्रयास है, जिसकी सफलता के अपने ख़ास मायने हैं।  विकसित देश एक द्रुतगामी और पुन: इस्तेमाल किए जा सकने वाले प्रक्षेपण यान के विचार को खारिज कर रहें हैं। बढ़ती लागत और दुर्घटनाओं की वजह से अमेरीकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा 2011 से ही स्पेस शटलों का प्रयोग बंद कर चुकी है। लेकिन भारत के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों के अनुसार उपग्रहों को कक्षा में प्रक्षेपित करने की लागत को कम करने का उपाय यही है कि रॉकेट को री-साइकिल किया जाए और इसे दोबारा इस्तेमाल के लायक बनाया जाए।

री-साइकिल प्रौद्योगिकी के सफल होने पर अंतरिक्षीय प्रक्षेपण की लागत को 10 गुना कम करके 2000 डॉलर प्रति किलो पर लाया जा सकता है। फिलहाल इसरो ने स्वदेश निर्मित पुन: प्रयोग योग्य प्रक्षेपण यान- प्रौद्योगिकी प्रदर्शक (रीयूजेबल लॉन्च व्हीकल- टेक्नोलॉजी डेमोनस्ट्रेटर यानी आरएलवी-टीडी) का सफल परीक्षण कर दुनियां के स्पेस मार्केट में एक हलचल जरूर पैदा कर दी है।

भारत के सफल चंद्र मिशन और मंगल मिशन के बाद इसरो व्यावसायिक तौर पर काफी सफ़ल रहा है और इसरों के प्रक्षेपण की बेहद कम लागत की वजह से दुनियां भर के कई देश अब इसरो से अपने उपग्रहों की लांचिंग करा रहें है। इससे स्पेस मार्केट में भारत के बढ़ते हुए वर्चस्य का पता चलता है।

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