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ब्लॉग : (केसर देवी) -विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता विकास स्वरूप ने भारत और पाकिस्तान के बीच “सिंधु जल समझौता” तोड़ने के संकेत दिए हैं। दिल्ली में आयोजित एक प्रेस कांफ्रेंस में विकास स्‍वरुप ने कहा कि किसी भी समझौते के लिए दोनों देशों में आपसी सहमति, विश्‍वास और सहयोग का होना बेहद जरुरी है। कोई भी समझौता एकतरफा नहीं हो सकता है। यदि भारत सिंधु जल समझौता तोड़ दे और पानी देना बंद कर दे तो यकीन मानिए पकिस्तान के पास 80% पानी की कमी हो जायेगी । साले हगने के बाद सौचने को तरस जायेंगे

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भारत और पाकिस्तान के बीच वर्ष 1960 में पंजाब की नदियों झेलम, रावी, सतलज, व्यास, चिनाब और सिंधु नदी के पानी का बंटवारा किया था और भारत ने सिंधु नदी के बहाव का बड़ा हिस्सा यानि अपने हिस्से का पानी बड़े भाई होने के दृष्टिकोण से पाकिस्तान को दिया था।

भारतीय इंजीनियरों ने कुछ साल पहले पंजाब में गुरदासपुर के पास बनाये गये नये जल संसाधन सोर्स से भारत का कुछ हिस्सा हरियाणा से जैसलमेर के मोहनगढ़ में लाकर पाईप लाईन के जरिए बाड़मेर तक पहुंचा दिया। आजकल जैसलमेर और बाड़मेर के गांव शहर में सिंधु नदी का पानी सप्लाई होता है और मीठा पानी है।

अगर भारत अपने हिस्से का जल पूरा मोड़कर राजस्थान में भिजवा दे तो यहां का रेगिस्तान हरा भरा हो जायेगा लेकिन पाकिस्तान के हिस्से में कम पानी आने से वहां अभी जो नहरों और पावर प्लांट का जाल बिछा हुआ है, सब बेकार हो जायेगा। वहां की जमीन रेगिस्तान में तब्दील हो जायेगी।

भारत के पास पहिले टैक्नोलॉजी नहीं थी, लेकिन अब हम सब निर्माण कर सकते हैं। यह समझौता बेमानी है, और भारत को अपने पूरे हिस्से को लेना चाहिए। थोड़ा सा लिया है जिसमें भी पाकिस्तान और वहां के अलगाववादी नेताओं के भाषणों में यह उल्लेख होता है।

यहां तक कि भारत अपने हिस्से के दिये गये पानी के अरबों रुपये पाकिस्तान से मांगता और वर्तमान हालात में यह समझौता तोड़ देना चाहिए।

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