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वाराणसी। जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की छवि दुनिया में एक बेहद गंभीर नेता की है, लेकिन जब वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होते हैं तो दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती है। दोनों नेताओं के बीच सियासी और कूटनीतिक रिश्तों से इतर करीबी दोस्ती का रिश्ता तब से है जब पीएम मोदी गुजरात के मुख्यमंत्री के तौर पर दो बार जापान गए थे और शिंजो आबे ने उनकी खास मेहमाननवाजी की थी।

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जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे की छवि दुनिया में एक बेहद गंभीर नेता की है, लेकिन जब वो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ होते हैं तो दोनों की केमिस्ट्री देखते ही बनती है।

मोदी ट्विटर पर तीसरी ऐसी शख्सियत थे, जिन्हें दुनिया के इस ताकतवर नेता ने फॉलो किया था। पीएम मोदी और आबे की पर्सनल केमिस्ट्री की तरह ही भारत और जापान के रिश्तों में भी सदियों से एक भावनात्मक और सांस्कृतिक रिश्ता रहा है। प्रधानमंत्री मोदी शिंजो आबे के साथ अपनी दोस्ती के जरिए भारत-जापान में इस पुराने रिश्ते को नई ताजगी देना चाहते हैं। यही वजह है कि दोनों नेताओं के व्यस्त कार्यक्रम के बीच बनारस में गंगा के तट पर भारत-जापान की साझी सांस्कृतिक विरासत को याद दिलाती गंगा आरती दर्शन का कार्यक्रम रखा गया!

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चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग जब सितंबर 2014 में भारत आए थे तब प्रधानमंत्री मोदी ने पहली बार किसी राष्ट्राध्यक्ष की दिल्ली से बाहर साबरमती के तट पर मेहमाननवाजी की थी और अब प्रधानमंत्री मोदी जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के साथ दिल्ली से दूर काशी में गंगा आरती दर्शन करेंगे। इसलिए ये कार्यक्रम एक सांस्कृतिक कार्यक्रम तो है ही लेकिन कूटनैतिक लिहाज से भी बेहद अहम है।

प्रधानमंत्री मोदी जब पिछले साल अगस्त में जापान गए थे तो वहां के प्रसिद्ध सांस्कृतिक शहर क्योटो भी गए थे जहां उन्होंने दो ऐतिहासिक बौद्ध मंदिरों के दर्शन किए थे। क्योटो ने पीएम मोदी को इस तरह प्रभावित किया कि वो अपने संसदीय क्षेत्र काशी को भी क्योटो की तरह ही आध्यात्मिक रूप से दिव्य और आधुनिक रूप से भव्य बनाने का सपना साथ लेकर आए। इसके बाद काशी और क्योटो के बीच एक समझौता भी हुआ कि किस तरह बनारस को क्योटो की तर्ज पर विकसित किया जाए। अब जापान के प्रधानमंत्री का काशी आना और गंगा तट पर गंगा आरती का दर्शन करना दोनों देशों के बीच एक नए विश्वास को आगे बढ़ाएगा।

केंद्रीय मंत्री पीयूष गोयल के मुताबिक भारत और जापान के बींच संबंध इतने मित्रता के हैं और क्योटो और वाराणसी के बींच एक समझौता भी है। दोनों राष्ट्रप्रमुखों की इस काशी यात्रा से शहर के लोगों में भी जबरदस्त उत्साह है। भारत आने वाले जापान के तमाम टूरिस्टों में भी दोनों देशों की साझी संस्कृति को समझने की चाहत बढ़ रही है।

दिल्ली से दूर काशी में गंगा तट पर 12 दिसंबर की शाम को जब गंगा आरती की ज्योति जलेंगी तो भारत और जापान की दोस्ती को एक नई रौशनी मिलेगी। ये रौशनी भारत और जापान की सदियों पुरानी साझा विरासत में एक नई चेतना तो फूंकेगी ही, लेकिन साथ ही ये भी तय है कि इससे काशी और भारत के विकास के नए रास्ते भी जगमगा उठेंगे।

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