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रात से नींद नहीं आ रही है। बार बार जेहन में पठानकोट आपरेशन गूँज रहा है। गूंज रहा है यह प्रश्न कि आखिर कब तक हम दो कौड़ी के आतंकवादियों को मारने के लिए अपने अमूल्य फौजी गंवाते रहेंगे? कब तक शान्ति की इस पहल में अपने जाबांजों को दांव पर लगाया जाता रहेगा? देश के जनमानस की तरह ही यह प्रश्न मेरे भी दिलो-दिमाग में  सतत हलचल मचाये हुए है।

समाधान क्या है? राजनीतिक समझदारी देश के जनमानस में अधिक नहीं होती। उसमे तो अपने देश के वीर सपूतों की रक्षा और उनके लिए स्थाई हल ढूंढने की जिद है। उनमे सीधी बात होती है। आर या पार। हालांकि इसमें नुकसान अधिक है, किन्तु क्या राजनीतिक तौर पर हम इतने जीवट वाले नहीं  बन सकते कि भारत का खौफ ऐसा कायम हो जाए कि कोई दुश्मन उसकी तरफ आँख उठाकर न देख सके?

मुझे प्रधानमंत्री की उस बात से कोई गुरेज नहीं कि हम आंख मिलाकर बात करना चाहते हैं। न किसी को दिखा कर और न ही उसे  झुका कर। ठीक है। कूटनीतिक रवैये के लिहाज से उचित है, किन्तु जो हमारी आंखों में धूल  झोंक रहा है, उसके लिए क्या? उसके लिए निश्चित रूप से एक ही उपाय है कि उसकी आंखें निकाल ली जाए। पर क्या ऐसी हिम्मत हमारी राजनीतिक बाहु में है ? या विदेश नीति और शान्ति प्रक्रिया के कोरे कागजों पर लकीरें खींचने का ही जो आजतक फंडा रहा है उसे ही आगे बढ़ाते रहना है?Pathankot Terror Attack: Six Pakistani Terrorists, Seven Soldiers Killed

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