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जन्मना जायते शूद्र:, संस्काराद् द्विज उच्यते।– मनु स्मृतिअर्थात मनुष्य शूद्र के रूप में उत्पन्न होता है तथा संस्कार से ही द्विज बनता है।
मनुस्मृति का वचन है- ‘विप्राणं ज्ञानतो ज्येष्ठम् क्षत्रियाणं तु वीर्यतः।’
अर्थात् ब्राह्मण की प्रतिष्ठा ज्ञान से है तथा क्षत्रिय की बल वीर्य से। जावालि का पुत्र सत्यकाम जाबालि अज्ञात वर्ण होते हुए भी सत्यवक्ता होने के कारण ब्रह्म-विद्या का अधिकारी समझा गया।
वेद और महाभारत पढ़ने पर हमें पता चलता है कि आदिकाल में प्रमुख रूप से ये जातियां थीं- देव, दैत्य, दानव, राक्षस, यक्ष, गंधर्व, किन्नर, नाग आदि। देवताओं को सुर तो दैत्यों को असुर कहा जाता था। देवताओं की अदिति, तो दैत्यों की दिति से उत्पत्ति हुई। दानवों की दनु से तो राक्षसों की सुरसा से, गंधर्वों की उत्पत्ति अरिष्टा से हुई। इसी तरह यक्ष, किन्नर, नाग आदि की उत्पत्ति मानी गई है।
प्रारंभ में सभी महाद्वीप आपस में एक-दूसरे से जुड़े हुए थे। इस जुड़ी हुई धरती को प्राचीन काल में 7 द्वीपों में बांटा गया था- जम्बू द्वीप, प्लक्ष द्वीप, शाल्मली द्वीप, कुश द्वीप, क्रौंच द्वीप, शाक द्वीप एवं पुष्कर द्वीप। इसमें से जम्बू द्वीप सभी के बीचोबीच स्थित है। इसमें जम्बू द्वीप में मानव का उत्थान और विकास हुआ। एक ही कुल और जाति का होने के बाद मानव भिन्न भिन्न जगहर पर रहकर हजारों जातियों में बंटता गया। पहले स्थानीय आधार पर जाति को संबोधित किया जाता था।
जाति को आज अलग अर्थों में लिया जाता है। जाति, समाज या संप्रदाय पर अध्ययन करने वाले जानते हैं कि सभी का अलग-अलग अर्थ होता है। आज हम जिसे जातिवाद कहते हैं वह दुनिया के सभी धर्मों में विद्यमान है। ऊंच और नीच की भावना सभी धर्मों में विद्यमान है। यहां यह लिखने की जरूरत नहीं है कि गैर-हिन्दू धर्मों में कौन-सा समाज खुद को ऊंचा मानता है

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