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अंग्रेजी कानून व्यवस्था (भाई ब्रिजेश बंसल जी के द्वारा लिपिबद्ध किया गया) १७ अगस्त २००२ का व्याख्यान : आज गम्भीर बातें नहीं हो रही हैं न समाज में न संसद में | जिनको देश को दिशा देनी चाहिये वो दिशाहीन हो गये हैं | दिशाहीन लोग समाज को दिशा नहीं दे पाते | मेरे जैसे आदमी को इस काम में लगना पड़ा ये मैं खुशी से नहीं लगा, देश की परिस्थितियाँ, देश के हालात, बढ़ते हुए अंतर्राष्ट्रीय दबाव, बढ़ती हुई गुलामी, टूटता हुआ समाज, शक्तिहीन होता हुआ समाज, बढ़ती हुई गरीबी, बेरोजगारी, ये तमाम बड़े कारण है जिन्होंने मेरे जैसे नौजवान को अन्दर से परेशान किया है | और उस परेशानी में ही मैं इस काम में लगा हूँ | मेरे सोचने का ढंग थोड़ा अलग है | किसी भी समस्या के बारे में जब विचार करता हूँ तो थोड़ा गहरे जाता हूँ उस समस्या में | उसका एक कारण ये भी हो सकता  है की मैं विज्ञान और तकनीकी का विद्यार्थी रहा हूँ | तो विज्ञान का विद्यार्थी होने के नाते जब तक किसी समस्या के इतिहास को समझ नहीं लेता तब तक वो समस्या मुझे समझ नहीं आती | तो जो वर्तमान में जो समस्याएं हैं उनको भी वैसे ही समझने की कोशिश की है और इस देश की समस्याओं को समझने में मैंने लगभग २० हज़ार दस्तावेज़ इकट्ठा किये है | ये जो दस्तावेज़ मैंने इकट्ठा किये हैं ये (Indian office of britain) के हैं लन्दन के, ब्रिटिश हाउस ऑफ कॉमन्स की लाइब्रेरी के हैं, दुनिया के और भी पुस्तकालय से हैं | कुछ दस्तावेज़ भारत की (archive) से निकाले हैं और उनके आधार पर मेरी जो समझ बनी वही आपको बताता हूँ | Untitled-1 copyवो सही भी हो सकती है और गलत भी तो विनम्रता से कहता हूँ की आपको कहीं गलत लगे तो आप जरूर मुझे सुधारने की कोशिश करें | ये बड़ा अभियान है , देश का काम है जिसमें मैं लगा हुआ हूँ और मुझसे गलती होगी तो सारे देश को उसका परिणाम भुगतना पड़ेगा तो ये आप की जिम्मेदारी है की मेरी गलतियों को सुधारे | देश आज़ाद हो गया है और आज़ादी के ५० साल पूरे हो गये हैं सारे देश में राजनीतिक स्तर पर जशन जैसा माहौल है हालाँकि उसकी आत्मा मरी हुई है | और माहौल इस तरह का है की हम तो आज़ाद हो गये हैं, ये देश गणतन्त्र हो गया है, और हिन्दुस्तान की संसद में भी आपने १४ अगस्त १९९७ को आपने जो कुछ हुआ वो आपने देखा ही होगा | आजादी का एक बड़ा मेला सा मनाया गया | इस देश में आजादी मनाने की भी कुछ ऐसी परम्पराएं पड़ रही हैं | जैसे उदाहरण के लिये देश में आज़ादी का जशन मनाने के लिये अमेरिका से एक संगीतज्ञ आ गया था यानी | तो हिन्दुस्तान की आज़ादी मनाने के लिये अमेरिका से संगीतकार बुलाया जाता है जो मेरी समझ के बाहर की बात है | उस यानी को हिन्दुस्तान की आज़ादी के बारे में क्या समझ है और कितनी समझ  है और साथ ही साथ उस यानी को संगीत की कितनी समझ है जो मेरे देश में चलता है और बजाया जाता है |

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फिर एक दिन अखबार में पढ़ा की हिन्दुस्तान की आज़ादी का जशन मनाने के लिये अमेरिका की एक नाटक कम्पनी आयी उसका नाम था पॉल टेलर की कम्पनी, तो पॉल टेलर की कम्पनी हिन्दुस्तान के १०-१२ शहरों में नाटक करती थी और पॉल टेलर उस नाटक के माध्यम से दिखाने की कोशिश करते थे | लेकिन उन को मालूम नहीं था की झांसी की रानी लक्ष्मीबाई कौन थी और उस ने क्या-क्या किया  | वो कोशिश करते थे हिन्दुस्तान की आजादी का इतिहास बताते थे लेकिन उसी दृष्टि से कोशिश करते थे जैसे अमेरिका वाले हिन्दुस्तान को देखते थे और दुर्भाग्य ये है हिन्दुस्तान की आजादी के जितने कार्यक्रम हो रहे हैं वो सब विदेशी कंपनियों द्वारा प्रायोजित हो रहे हैं |

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