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अजामिल पहले बहुत संयमी तथा सदाचारी था। पर एक बार उसने क्षण भर के लिये नेत्रों से विषयासक्त लोगों की विषयासक्ति उमड़ उठी और वह महापापी बन गया। उसने पूर्वाभयावश अपने एक पुत्र का नाम ‘नारायण’ रखा था। मरते समय से लेने भयानक आकृतिवाले तीन यमदूत आ गये। उसने डरके मारे व्याकुल होकर पुत्र के लिये ऊंचे स्वर से – ‘नारायण’ पुकारा। भगवान् के पार्षदोंने मरते समय उसे ‘नारायण’ नामका उच्चारण करते सुनकर, वहां प्रकट होकर बड़े शास्त्रार्थ के बाद उसे भयानक यमदूतों से बलपूर्वक छुड़ा लिया। अजामिल यमदूतों के फंदे से छूटकर निर्भय और स्वस्थ हो गया। अपमानित यमदूतों ने आकर यमराज से सारी घटना बताकर पूछा कि हम तो आपको ही पाप-पुण्य के निर्णय का दण्डदाता तथा सर्वोपरि शासक मानते थे। क्या आपसे भी ऊपर कोई और है?’ इस पर यमराज ने चराचर के स्वामी भगवान् को सर्वोपरि बताकर कहा कि ‘यह उनके नामोच्चारणकी महिमा है’। इसके बाद उन्होंने अपने दूतों को रहस्य बताकर जो चेतावनी दी, उसी का कुछ अंश नीचे दिया जा रहा है। यमराज ने कहा –“स्वयं भगवान ने ही धर्म की मर्यादा का निर्माण किया है। उसे न तो ऋषि जानते हैं और न देवता या सिद्धगण ही। ऐसी स्थिति में मनुष्य, विद्याधर, चारण और असुर आदि तो जान ही कैसे सकते हैं। भगवान् के द्वारा निर्मित ‘भागवतधर्म’ परम शुद्द और अत्यन्त गोपनीय है। उसे जानना बहुत ही कठिन है। जो उसे जान लेता है, वह भगवत्स्वरुप को प्राप्त हो जाता है। दूतो! भागवतधर्म का रहस्य हम बारह व्यक्ति ही जानते हैं – ब्रह्माजी, देवर्षि नारद, भगवान् शंकर, सनत्कुमार, कपिलदेव, स्वायम्भुव मनु, प्रह्लाद, जनक, भीष्मपितामाह, बलि, शुकदेवजी और मैं (धमराज)। इस जगत् में जीवों के लिये बस यही सबसे बड़ा कर्तव्य – परम धर्म कि वे नाम – कीर्तन आदि उपायों से भगवान के चरणों में भक्ति प्राप्त कर लें –

नामोच्चारणमाहात्म्यं हरेः पश्यत पुत्रकाः।
अजामिलोऽपि येनैव मृत्युपाशादमुच्यत।।

प्रिय दूतों! भगवान् के नामोच्चारणकी महिमा तो देखो, अजामिल – जैसा पापी बी एक बार नामोच्चारण करनेमात्र से मृत्युपाश से छुटकारा पा गया। भगवान् के गुण, लीला और नामों का भलीभांति कीर्तन मनुष्यों के पापों का सर्वथा विनाश कर दे, यह कोई उसका बहुत बड़ा पल नहीं है; क्योंकि अत्यन्त पापी अजामिल ने मरने के समय चञ्चल चित्तसे अपने पुत्र का नाम ‘नारायण’ उच्चारण किया। इस नामाभासमात्र से ही उसके सारे पाप तो क्षीण हो ही गये, मुक्ति की प्राप्ति भी हो गयी। बड़े-बड़े विद्वानों की बुद्धि भी भगवान् की माया से मोहित हो जाती है। वे कर्मों के मीठे-मीठे फलों का वर्णन करने वाली अर्थवादरूपिणी वेदवाणी में ही मोहित हो जाते हैं और यज्ञ-यागादि में बड़े-बड़े कर्मों में ही संलग्न रहते हैं तथा इस सुगमातिसुगम भगवन्नाम की महिमा को नहीं जानते। यह कितने खेद की बात है।

“प्रिय दूतों! बुद्धिमान पुरुष ऐसा विचार कर भगवान अनंत में ही संपूर्ण अंत:करण से अपना भक्ति-भाव स्थापित करते हैं। वह मेरे दण्ड के पात्र नहीं हैं। पहली बात तो यह है कि वे पाप करते ही नहीं; परंतु उसे भगवान का गुणगान तत्काल नष्ट कर देता है। जो समदर्शी साधु भगवान को ही अपना साध्य और साधन-दोनों समझ कर उन पर निर्भर हैं, बड़े-बड़े देवता और सिद्ध उनके पवित्र चरित्रों का प्रेम से गान करते रहते हैं। मेरे दूतों! भगवान की गदा उनकी सदा रक्षा करती रहती है। उनके पास तुम लोग कभी भूलकर भी मत फटकना। उन्हें दण्ड देने का सामर्थ्य ना हममें है और ना साक्षात काल में ही। बड़े-बड़े परमहंस दिव्य रस के लोभ से संपूर्ण जगत और शरीर आदि से भी अपना अहंता-ममता हटाकर, अकिंचन होकर निरंतर भगवान मुकुंद के पादारविन्द का मकरंद-रसपान करते रहते हैं। जो दुष्ट उस दिव्य रस से विमुख हैं और नरक के दरवाजे घर-गृहस्थी की तृष्णा का बोझा बांधकर उसे ढो रहे हैं, उन्हीं को मेरे पास बार-बार लाया करो।

जिह्वा न वक्ति भगवद्गुणनामधेयं चेतश्च न स्मरति तच्चरणारविन्दम्।
कृष्णाय नो नमति यच्छिर एकदापि तानानयध्वमसतोऽकृतविष्णुकृत्यान्। ।

“जिनकी जीभ भगवान के गुणों और नामों का उच्चारण नहीं करती, जिनका चित्त उनके चरणारविंदों का चिंतन नहीं करता और जिनका सिर एक बार भी भगवान श्रीकृष्ण के चरणों में नहीं झुकता, उन भगवत्सेवाविमुख पापियों को ही मेरे पास लाया करो।”

“आज मेरे दूतों ने भगवान के पार्षदों का अपराध करके स्वयं भगवान का ही तिरस्कार किया है। यह मेरा ही अपराध है। पुराणपुरुष भगवान नारायण हम लोगों का यह अपराध क्षमा करें। हम अज्ञानी होने पर भी उनके निज्जन, और उनकी आज्ञा पाने के लिए अंजलि बांधकर सदा उत्सुक रहते हैं। अत: परम महिमांवित भगवान के लिए यही योग्य है कि वे क्षमा कर दें। मैं उन सर्वांतर्यामी एकरस अनंत प्रभु को नमस्कार करता हूं।”

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