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इन दिनों फिल्म उड़ता-पंजाब को लेकर राजनीति से लेकर फिल्मी जगत में गहमागहमी का माहौल है। भारत में फिल्मों को हरी झंडी देने वाले सेंसर बोर्ड के एतराज से एक बार फिर अभिव्‍यक्‍ति की आजादी का मुद्दा हवा मैं तैर गया है। हालांकि उड़ता-पंजाब पंजाब की डोर तो अब बॉम्‍बे हाईकोर्ट के हाथ पहुंच गई है, लिहाजा कैसे भी कट-पिट कर फिल्‍म की रिलीज का रास्‍ता साफ होने की संभावना जरूर पैदा हो गई है।

इधर, सेंसर बोर्ड के इस रवैये और बोर्ड के अध्‍यक्ष पहलाज निहलानी के  उड़ता-पंजाब के विवाद में खुद को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का चमचा बताने के बाद अब यह सवाल भी हवा में तैर गया है कि क्‍या अब ऐसी फिल्‍मों पर वाकई कैंची चलने लगेगी, जो किसी न किसी तरह से सत्‍ता विरोध के आसपास घूम रही हो।

देखा जाए तो सेंसर बोर्ड लगभग अधिकतर फिल्मों में कुछ सीन पर कैंची चलाती है, चाहे वो अश्लीलता से लेकर कोई और संवदेनशील मुद्दा हो, लेकिन सेंसर बोर्ड के इस रवैये के बीच अब एक ऐसी फिल्‍म भी रिलीजिंग की कतार में है, जो बीजेपी ही नहीं बल्‍कि सेंसर बोर्ड का भी ब्‍लड प्रेशर बढ़ा सकती है। हालांकि सेंसर बोर्ड इस फिल्‍म के सीन तो काटने की बात दूर, इसे रिलीज करने के लिए ही राजी नहीं हो रहा है।

दरअसल, यह फिल्म प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से जुड़ी हुई है और इसे नरेंद्र मोदी और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल के चुनाव को लेकर बनाया गया है। अब चूंकि मामला प्रधानमंत्री के नाम से जुड़ गया है, जाहिर है ये फिल्‍म पहले ही विवादों में आ गई है। इस फिल्‍म  को दो बार राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीत चुके कमल स्वरूप ने बनाया है और फिल्‍म का नाम ‘बैटल फॉर बनारस” है। फिल्‍म अभी भी सेंसर बोर्ड की फाइलों में अटकी हुई है।

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